40+ Best Collection of Tenali Rama stories in Hindi with moral:- हिंदी में

 Best Tenali Rama stories in Hindi moral 

Tenali Rama stories in Hindi images

Best Tenali Rama stories in Hindi moral #1
कौन थे Tenali रामा 

तेनालीराम का जन्म 16 वीं शताब्दी में भारत के आन्ध्रप्रदेश राज्य के गुन्टूर जिले के गाँव – गरलापाडु में हुआ था। तेनालीराम एक तेलुगू ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। वह पेशे से कवि थे, व तेलुगू साहित्य के महान ज्ञानी थे। अपने वाक चातुर्य के कारण वह काफी प्रख्यात थे। और उन्हे “विकट कवि” के उपनाम से संबोधित किया जाता था। तेनालीराम के पिता गरलापती रामय्या, तेनाली गाँव के रामलिंगेश्वरास्वामी मंदिर के पुजारी हुआ करते थे।

तेनालीराम जब आयु में युवा थे तभी उनके के पिता गरलापती रामय्या की मृत्यु हो गयी। और उसके बाद उनकी माता उन्हें लेकर अपने गाँव तेनाली, अपने भाई के पास रहने चली गयी थी। तेनालीराम शिव भक्त भी थे। इस लिए उन्हे तेनाली रामलिंगा के नाम से भी पुकारा जाता था। इतिहास कारों के मुताबिक कुछ समय के बाद उन्होंने वैष्णव धर्म अपना लिया था।

तेनालीराम को पाठशाला का विधिवत अभ्यास नहीं प्राप्त हुआ था, पर उनकी सीखने की तीव्र इच्छा और ज्ञान के प्रति धुन, के कारण उन्हे शिश्यावृति प्राप्त हुई थी। परंतु उनके पूर्व शिव भक्त होने के कारण उन्हे वैष्णव अनुयायियों द्वारा एक शिष्य की तरह स्वीकारा नहीं गया था, फिर एक महान संत ने उन्हे काली की पूजा करने की सलाह दी। और ऐसा कहा जाता है के संत की बात मान कर तेनालीराम ने काली देवी की खूब तपस्या की। और उसी के परिणाम स्वरूप तेनालीराम को देवी काली से उत्कृष्ट हास्य कवी बनने का वरदान मिला।

तेनालीराम ने अपने आगे के जीवन में “भागवत मेला” मंडल के साथ जुड़ाव किया। और एक दिन “भागवत मेला” मंडल, महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में अपना कार्यक्रम प्रदर्शित करने के लिए पहुंचा।उन्होंने अपने प्रभावशाली प्रदर्शन से राजा कृष्णदेव राय को बहुत प्रभावित कर दिया और कृष्णदेव राय तेनालीराम को अपने दरबार में आठवे स्कॉलर (अस्ठदिग्गज) मंडल में हास्य कवी के पद पर शामिल कर लिया।

महाराज कृष्णदेव राय – वर्ष 1509 से 1529 तक विजयनगर की राजगद्दी पर विराजमान थे, तब तेनालीराम उनके दरबार में एक हास्य कवी और मंत्री सहायक की भूमिका में उपस्थित हुआ करते थे। इतिहासकारों के मुताबिक तेनालीराम एक हास्य कवी होने के साथ साथ ज्ञानी और चतुर व्यक्ति थे। तेनालीराम राज्य से जुड़ी विकट परेशानीयों से उभरने के लिए कई बार महाराज कृष्णदेव राय की मदद करते थे। उनकी बुद्धि चातुर्य और ज्ञान बोध से जुड़ी कई कहानिया है जिनमे से कुछ चुनिन्दा कहानियाँ इस ऍप में बताई गयी हैं।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #2

बुरे फंसे दरबारी

महाराज कृष्णदेव राय की दिनचर्या थी कि वे सुबह-सुबह राज उद्यान में टहलने जाया करते थे और उस समय उनके साथ केवल तेनालीराम ही होते थे। इसी समय महाराज बहुत से गम्भीर निर्णय ले लिया करते थे, कई भविष्य की योजनाएं बना लिया करते थे, जिसकी खबर तेनालीराम को तो होती थी, किन्तु बाकी दरबारियों को कोई भी बात समय के साथ ही पता चलती थी।

अत: कुछ दरबारियों ने सोचा कि महाराज के साथ तेनालीराम का घूमना बंद कराया जाए। अत: एक रात उन्होंने कुछ गायें लाकर राज उद्यान में छोड़ दीं। रात भर में गायों ने उद्यान को उजाड़कर रख दिया। अगले दिन महाराज भोर में अकेले ही वहां आए तो गायों को वहां चरता देख और उद्यान की उजड़ी हुई हालत देखकर वे आग-बबूला हो उठे।

उन्होंने फौरन माली को तलब किया- “ये गायें राज उद्यान में कैसे आईं।” “म…महाराज।” सहमकर माली बोला- “ये गायें तो तेनालीराम जी ने यहां छुड़वाई ओं।” “तेनालीराम ने?” महाराज को बड़ा आश्चर्य हुआ। इसी बीच अन्य दरबारी भी उद्यान में आ गए।

मामले को समझते ही वे बोले- “महाराज! दरअसल तेनालीराम को आप हर रोज अपने साथ घूमने के लिए बुला लेते हैं, इसी कारण क्रोधित होकर उसने ऐसा कदम उठाया होगा कि न उद्यान रहेगा, न आप घूमेंगे और न समय-असमय उन्हें बुलाएंगे।”

महाराज को यह सुनकर बड़ा क्रोध आया। उन्होंने तुरन्त आदेश दिया कि उद्यान में हुए नुकसान के बदले तेनालीराम से पांच हजार स्वर्ण मुद्राएं वसूली जाएं और इन गायों को राज्य की पशुशाला में भिजवा दिया जाए। दिन चढ़ते-चढ़ते ये खबर तेनालीराम तक भी जा पहुंची।

तीन दिन तक वह दरबार में आए ही नहीं। तीन दिन बाद दरबार में आए। उनके साथ कुछ ग्वाले भी थे। तेनालीराम ने महाराज को प्रणाम किया और बोले: “महाराज! मुझसे जुर्माना वसूल करने का आदेश देने से पहले आप कृपा कर इनकी बात सुन लें। उसके बाद ही मेरे बारे में कोई राय कायम करें।”

“ठीक है।” महाराज ग्वालों से मुखातिब हुए: “क्या कहना चाहते हैं आप लोग ?” “महाराज! आपके कुछ दरबारी हमसे हमारी गायें खरीदकर लाए थे, मगर उन्होंने आज चौथे दिन तक भी उन गायों की कीमत अदा नहीं की। हमारी महाराज से विनती है कि हमें हमारी गायों की कीमत दिलाई जाए।”


राजा कृष्णदेव राय ने सारी बात की जांच की तो पता चला कि तेनालीराम को बदनाम करने के लिए दरबारियों ने यह चाल चली थी। महाराज ने हुक्म दिया कि जो पाच हजार स्वर्ण मुद्राओं का जुर्माना तेनालीराम को भरना था, वह जुर्माना अब गायों को खरीद कर लाने वाले दरबारी भरेंगे तथा गायों की कीमत भी वे ही चुकाएंगे। ये कार्य अविलम्ब आज ही हो। इस प्रकार तेनालीराम की बुद्धि से वे बेचारे एक बार फिर मात खा गए।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #3
कुबड़ा  धोबी

एक बार कोई दुष्ट व्यक्ति साधु का वेश बनाकर लोगों को अपने जाल में फंसाता और धतूरा आदि खिलाकर लूट लेता था। यह काम वह उनके शत्रुओं के कहने पर धन के लालच में करता था। धतूरा खाकर कोई व्यक्ति मर जाता तो कोई पागल हो जाता था।

तेनालीराम को यह बात पता चली तो उन्हें बड़ा दुख हुआ। उन्होंने सोचा कि ऐसे व्यक्ति को दण्ड अवश्य ही मिलना चाहिए। मगर एकाएक ही कुछ नहीं किया जा सकता था क्योंकि धतूरा खिलाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कोई सबूत नहीं था, यही कारण था कि वह सरेआम सीना-ताने सड़कों पर घूम रहा था।

तेनालीराम को पता चला कि एक व्यक्ति आजकल पागल हुआ सड़कों पर घूम रहा है और वह उस साधु का ताजा-ताजा शिकार है। एक दिन तेनालीराम की नजर धतूरा खिलाने वाले उस धूर्त पर पड़ी तो वे उसके पास पहुंचे और बातों में उलझाकर उस पागल के पास ले गए।

फिर मौका पाकर उसका हाथ पागल के सिर पर दे मारा। उस पागल ने आव देखा न ताव, उसके बाल पकड़कर उसका सिर एक-पत्थर से टकराना शुरू कर दिया। पागल तो वह था ही, अपने जुनून में उसने उसे तभी छोड़ा जब उसके प्राण पखेरू उड़ गए। मामला महाराज तक पहुंचा।

उस दुष्ट के रिश्तेदारों ने तेनालीराम पर आरोप लगाया कि उसने जानबूझकर उस व्यक्ति को पागल से मरवा दिया। महारज ने पागल को तो पागलखाने में भिजवा दिया, मगर क्रोध में तेनालीराम को यह सजा दी कि उसे हाथी के पांव से कुचलवा दिया जाए क्योंकि इसने पागल का सहारा लेकर इस प्रकार एक व्यक्ति की हत्या की है।

दो सिपाही उसी दिन शाम को तेनालीराम को जंगल में एक सुनसान स्थान पर ले गए और गरदन तक उसे धरती में गाड़कर हाथी लेने चले गए। सिपाहियों को गए हुए अभी कुछ ही समय हुआ था कि एक कुबड़ा धोबी वहां आ पहुंचा : “क्यों भई! यह क्या माजरा है ? तुम इस तरह जमीन में क्यों गड़े हो ?”

“भाई! मैं भी कभी तुम्हारी तरह कुबड़ा था। पूरे दस वर्षों तक मैं इस कष्ट से दुखी रहा। जो देखता, वही मुझ पर हंसता और फलियां कसता था। यहां तक कि मेरी पत्नी भी मुझे अपमानित करती थी। आखिर एक दिन मुझे एक महात्मा मिले।

उन्होंने मुझे बताया कि इस पवित्र स्थान पर गरदन तक धरती में धंसकर बिना एक भी शब्द बोले, औखें बंद किए खड़े हो जाओगे तो तुम्हारा सारा कष्ट दूर हो जाएगा। मिट्टी खोदकर मुझे बाहर निकालकर जरा देखो तो सही फकि मे’रा कूबड़ दूर हुआ या नहीं।”


यह सुनते ही धोबी जल्दी-जल्दी उसके चारों ओर की मिट्टी हटाने लगा। कुछ देर बाद जब तेनालीराम बाहर आया तो धोबी ने देखा कि उसकी पीठ पर तो कूबड़ का नामो-निशान भी नहीं है। वह बोला- “मित्र! मैं भी वर्षों से कूबड़ के इस बोझ को अपनी पीठ पर लादे घूम रहा हूं। मैं भी अब इससे छुटकारा पाना चाहता हूं।

मेहरबानी करके मुझे भी यहीं गाड़ दो और मेरे ये कपड़े धोबी टोले में जाकर मेरी बीवी को दे देना। उसे यहां का पता बताकर कह देना कि मेराकल सुबह का नाश्ता वह यहीं ले आए। मेरे दोस्त! मैं जीवन भर तुम्हारा यह एहसान नहीं भूलूंगा।

और हां, मेरी पत्नी को यह हरगिज न बताना कि कल तक मेरा यह कूबड़ ठीक हो जाएगा। मैं कल उसे हैरान होते देखना चाहता हूं।” “बहुत अच्छा।” तेनालीराम ने कहा, फिर उसे गरदन तक धरती में गाड़ दिया और उसके कपड़ों की गठरी उठाकर धोबी टीले की ओर चलने को हुआ लेकिन जाने से पहले वह उसे यह हिदायत देना नहीं भूला था:

“अपनी आखें और मुंह बंद रखना मित्र। चाहे कुछ भी क्यों न हो जाए यदि तुमने औखें खोलीं या मुंह से कोई आवाज निकाली तो तुम्हारी सारी मेहनत बेकार चली जाएगी अएएर तुम्हारा यह कूबड़ भी बढ्‌कर दोगुना हो जाएगा।”

“तुम चिन्ता मत करो मित्र। इस कूबड़ के कारण मैंने बड़े दुख उठाए हैं। इससे छुटकारा पाने के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार हूं।” धोबी ने उसे आश्वासन दिया।इसके बाद तेनालीराम चलता बना। उधर, राजा के सिपाही जब उस स्थान पर हाथी को लेकर पहुंचे तो वहां तेनालीराम के स्थान दर किसी अन्य को देखकर चौंके और उससे पूछा- “ऐ ! तू कौन है ? किसने तुझे इस खड्डे में गाड़ा है।”

धोबी कुछ न बोला। “ओ मूर्ख! कुछ बोलता क्यों नहीं, यहां सजा प्राप्त एक आदमी गड़ा हुआ था और हम हाथी से उसका सिर कुचलवाने के लिए हाथी लेने गए थे। लगता है तू अपराधी का कोई रिश्तेदार है और तूने उसे भगा दिया है। खैर! कोई बात नहीं, हम तेरा ही सिर कुचलवा देते हैं।”

यह सुनते ही धोबी की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। जल्दी से उसने औखें खोलीं और बोला: “नहीं-नहीं दरोगा जी, ऐसा जुल्म न करना : मैं किसी अपराधी का रिश्तेदार नहीं बल्कि कुबड़ा धोबी हूं। मैं तो अपना कूबड़ ठीक करने के लिए…।” इस प्रकार उसने उन्हें पूरी बात बता दी।

“अरे मूर्ख! इस प्रकार भी भला किसी का कूबड़ ठीक होता है: तूने एक अपराधी की मदद करके उसे भगाया है, अब तुझे दण्ड मिलेगा।” धोबी ने सोचा कि बुरे फंसे। मगर उसने अपना संयम नहीं खोया और कुछ सोचकर बोला: “देखिए दरोगा जी! यदि आप मुझे दण्ड दिलवाएंगे तो दण्ड से आप भी नहीं बचेंगे।

मृत्युदण्ड पाए उस खतरनाक अपराधी को आपको अकेला नहीं छोड़ना चाहिए था। आपकी लापरवाही के कारण ही वह भाग निकला-जब महाराज को मैं ये बात समझा दूंगा तो दोषी मैं नहीं, आप माने जाएंगे।” सिपाहियों को तुरन्त यह बात समझ आ गई, मगर अब करें भी तो क्या ?

तभी उन्हें एक वृद्ध अपनी ओर आता दिखाई दिया। “क्या बात है दरोगा जी-किस उलझन में फंसे हैं।” दरोगा ने उस वृद्ध को जल्दी-जल्दी पूरी बात बताई तो वृद्ध बोला- “आप व्यर्थ ही चिंतित हो रहे हैं। आप फौरन जाकर महाराज से कहें कि अपराधी को धरती निगल गई। बाकी कोई जिक्र आप लोग करना ही मत।”

सिपाहियों की समझ में पूरी बात आ गई। वह वृद्ध और कोई नहीं तेनालीराम थे। उधर-किसी सूत्र से महाराज को उस व्यक्ति की हकीकत पता चल चुकी थी कि वह धूर्त और पाखण्डी था। महाराज का क्रोध भी अब चूंकि शान्त हो चुका था, इसलिए उन्हें तेनालीराम की बहुत याद आ रही थी और साथ ही दुख भी हो रहा था कि क्यों उन्होंने क्रोध में आकर ऐसा सख्त आदेश दिया।

तभी वे दोनों सिपाही और वह बूढ़ा वहां हाजिर हुए तथा बताया कि महाराज अपराधी को धरती निगल गई। सुनते ही महाराज खुशी से उछल पड़े: “वाह-वाह! हम समझ गए कि तेनालीराम अपनी बुद्धि से बच निकला है, ईश्वर का लाख-लाख शुक्र है-तुम लोग हालांकि दण्ड के अधिकारी हो, किन्तु तेनालीराम के जीवित बचने की खुशी में हम तुम्हें अभयदान देते हैं, मगर शर्त यह है कि तुम्हें कल तक तेनालीराम को हमारे समक्ष हाजिर करना होगा, अन्यथा तुम्हें कठोर दण्ड दिया जाएगा।”

“महाराज की जय हो।” तभी सिपाहियों के साथ आए बूढ़े ने अपना वेश उतार दिया और बोला: “तेनालीराम हाजिर है।” “ओह! तेनालीराम…।” महाराज ने उसे गले से लगा लिया: “हम अपने फैसले पर बहुत पछता रहे थे।” उनसे जलने वाले दरबारी एक बार फिर मन मारकर रह गए कि कमीना इस बार तो मृत्यु को ही धोखा देकर लौट आया।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #4
कर्ज का बोझ 

एक बार तेनालीराम की पत्नी बीमार पड गई तो तेनालीराम को उसके इलाज के लिए महाराज से हजार स्वर्ण मुद्राएं उधार लेनी पड़ी। खैर, उचित देखभाल और इलाज से उसकी पत्नी ठीक हो गई।

एक दिन महाराज ने तेनालीराम से कहा- “तेनालीराम! अब हमारा कर्जा चुकाओ।” तेनालीराम कर्ज की वह रकम देना नहीं चाहते थे। अत: हां-हूं और आज-कल करके बात को टाल रहे थे। एक बार महाराज ने उससे बड़ा ही सख्त तगादा कर दिया।

महाराज जितना सख्त तगादा करते, तेनालीराम की कर्ज न देने की इच्छा दृढ़ होती जाती। एक दिन तेनालीराम ने सोचा कि राजा का कर्ज राजा के मुंह से ही माफ करवाऊंगा। दूसरे दिन ही महाराज के पास खबर आई की तेनालीराम बहुत सख्त बीमार हैं और अगर अंतिम समय में महाराज उसका चेहरा देखना चाहते हैं तो देख लें।

महाराज फौरन उसके घर पहुंचे, देखा कि तेनालीराम बिस्तर पर पडे हैं और उनकी पत्नी और मां रो रही हैं। महाराज को देखते ही तेनाली की पत्नी बोली: “महाराज यह बड़े कष्ट में हैं। इनके बचने की कोई उम्मीद नहीं है। मगर कहते हैं कि जब तक मुझ पर राजा का उधार है, तब तक मेरे प्राण आसानी से नहीं निकलेंगे।”

महाराज की आखें भर आईं। वे बोले: “तेनालीराम! मुझे तुम्हारी मृत्यु का दुःख तो बहुत होगा। तुम्हारी कमी मेरे जीवन में कोई पूरी नहीं कर सकता, मगर मैं तुम्हें इस प्रकार कष्ट भोगते भी नहीं देख सकता-मैंने तुम्हारा कर्ज माफ किया तेनालीराम-सच तो यह है कि ये मुद्राएं मैं वापस लेना ही नहीं चाहता था, मैं तो कर्ज का तगादा कर-करके यह देखना चाहता था कि देखें इस कर्ज से तुम किस प्रकार मुक्ति पाते हो।”

“फिर ठीक है महाराज!” तेनालीराम बिस्तर से उठ खड़े हुए। “अरे…अरे तेनालीराम-तुम्हारी तबीयत…।” “अब बिस्कूल ठीक है महाराज- दरअसल मैं तो आपके कर्ज के बोझ से मर रहा था, किन्तु अब जब आपने कर्ज माफ ही कर दिया है तो कैसा मरना-आप धन्य हैं महाराज, जो आपने मुझे असमय ही मरने से बचा लिया-मैं तो चाहता हूं कि मैं जन्म-जन्म आप जैसे कृपालु राजा की सेवा करता रहूं।” ठगे हुए से महाराज उसका चेहरा देखते रह गए।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #5
रिवाज 

एक बार तेनालीराम और महाराज में बहस छिड़ गई कि लोग किसी की बात पर जल्दी विश्वास कर लेते हैं या नहीं? तेनालीराम का कहना था कि लोगों को आसानी से बेवकूफ बनाकर अपनी बात मनवायी जा सकती है।

महाराज का कहना था कि यह गलत है। लोग इतने मूर्ख नहीं कि किसी की बात पर भी आख मूंदकर विश्वास कर लें। महाराज ने कहा: “तुम किसी से भी जो चाहो नहीं करवा सकते।” “क्षमा करें महाराज! मैं अपने अनुभव से कह रहा हूं कि यदि आपमें योग्यता है तो आप सामने वाले से असम्भव से असम्भव कार्य भी करवा सकते हैं-बल्कि मै तो यहां तक कहूंगा कि यदि मैं चाहूं तो किसी से आप पर जूता भी फिंकवा सकता हूं।”

“क्या कहा ?” महाराज ने आखें तरेरीं- ” हम तुम्हें चुनौती देते हैं तेनालीराम कि तुम ऐसा करके दिखाओ।” “मुझे आपकी चुनौती स्वीकार है महाराज!” तेनालीराम ने सिर झुकाया: “किन्तु इसके लिए मुझे कुछ समय चाहिए।” “तुम जितना चाहो समय ले सकते हो।” दृढ़ता से महाराज ने कहा।

और उस दिन बात आई-गई हो गई। तेनालीराम और महाराज दोनों ही अपने-अपने कार्यों में व्यस्त हो गए। दो माह बाद महाराज कृष्णदेव राय ने कुर्ग प्रदेश के एक पहाड़ी सरदार की सुन्दर बेटी से अपना विवाह तय किया। पहाड़ी इलाके के सरदार को विवाह के समय महाराज के परिवार के रीति-रिवाजों का पता न था।

उसने जब महाराज के सामने अपनी यह परेशानी रखी तो वे बोले: “इस विषय में तुम्हें किसी प्रकार की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है-हमें केवल आपकी पुत्री चाहिए।” परन्तु सरदार फिर भी न माना। वह अपनी इकलौती बेटी के विवाह में किसी भी प्रकार की कमी नहीं रखना चाहता था, अत: उसने चुपचाप तेनालीराम से सम्पर्क किया।

तेनालीराम ने उसकी समस्या जानकर दिलासा दी कि आप चिन्ता न करें, मैं सभी रस्में अदा करवाने वहां उपस्थित रहूंगा। सरदार को बेहद प्रसन्नता हुई। मगर तेनालीराम ने उसे समझा दिया कि वह इसे बात का जिक्र किसी से न करे।

तेनालीराम ने उससे कहा: “महाराज कृष्णदेव राय के वंश में एक रिवाज यह भी है कि विवाह की सभी रस्में पूरी हो जाने पा दुल्हन अपने पांव से मखमल की जूती उतारकर सजा दा फेंकना बाद दूल्हा दुल्हन को अपने घर ले जाता है।

मैं चाहता हूं कि लगे हाथों यह रस्म रस्म भी पूरी हो जाए, इसीलिए मैं गोवा के पुर्तगालियों से एक जोड़ा जूतियां भी ले आया हूं। पुर्तगालियों ने मुझे उनाग इ यह रिवाज तो यूरोप में भी है, लेकिन वहां चमड़े के जूते फेंके जाते हैं। हमारे यहां तो चमड़े की जुती की बात सोची भी नहीं जा सकती। हां, मखमल की जूती की बात कुछ और ही है। “

“एक बार और सोच लें तेनालीराम जी-जूती तो जूती ही होती है, फिर चाहे वह मखमल को हो या चमड़े की। पत्नी द्वारा पति पर जूती फेंकना क्या उचित होगा?” सरदार ने शंकित लहजे में कहा: “हम तो बेटी वाले हैं, कहीं ऐसा न हो कि लेने के देने पड़ जाएं।” “देखिए साहब! विजय नगर के राजघराने में यह रस्म तो होती ही आई है।

अब आप यदि इसे न करना चाहें तो कोई बात नहीं।” “नहीं-नहीं तेनालीराम जी! कोई भी रस्म अधूरी नहीं रहनी चाहिए यदि ऐसा हुआ तो ससुराल में बेटी को अपमानित होना पड़ सकता है। लाइए वह जूती मुझे दीजिए। मैं अपनी बेटी के विवाह में कोई कसर नहीं रखना चाहता।”

विवाह की बाकी सभी रस्में पूरी हो चुकी थीं। महाराज को डोली की विदाई का इंतजार था। दुल्हन को बाहर लाकर दहेज के सामान के पास ही एक स्थान पर बैठा दिया गया था। अचानक दुल्हन ने अपने पांव से मखमल की जूती उतारी और मुस्कराते हुए महाराज पर फेंक मारी।

महाराज की भृकुटि तन गई। वह क्रोध और अपमान से तिलमिलाकर उठना ही चाहते थे कि तभी पास बैठे तेनालीराम ने उनका हाथ दबा दिया और जल्दी से उनके कान के पास मुंह ले जाकर बोले: “महाराज! क्रोध न करें और इन्हें क्षमा कर दें। ये सब मेरा किया धरा है।”

“ओह!” महाराज को तुरन्त उस दिन की बात याद आ गई और वह मुस्करा दिए। फिर रानी की जूती उठाकर उनके करीब आए और जूती वापस दे दी। “क्षमा करें महाराज! आपके वंश की रस्म अदा करने के लिए…।” “कोई बात नहीं प्रिये-तेनालीराम हमें सब कुछ बता चुके हैं।”

और फिर जब महल लौट आए तो तेनालीराम से मुखातिब होकर वे बोले: “तुमने ठीक ही कहा था तेनालीराम-लोग किसी की भी बात पर विश्वास कर लेते हैं।”
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #6
बाग की हवा दरबार में

उन दिनों भीषण गर्मी पड़ रही थी। महाराज के दरबार तक में काफी उमस थी। सभी के शरीर पसीने से नहाए हुए थे। दरबारियों की तो कौन कहे, स्वयं महाराज पसीने से लथपथ थे। राजपुरोहित को कुछ ज्यादा ही गर्मी सता रही थी, अत: बोले: “महाराज! सुबह-सवेरे की बाग की हवा कितनी शीतल और सुगंधित होती है।

क्या ऐसी हवा दरबार में नहीं लायी जा सकती ?” “वाह-वाह राजगुरु-गर्मी से छुटकारा पाने का उपाय तो उत्तम बताया है तुमने।” महाराज खुश हो गए फिर दरबारियों से मुखातिब हुए: “क्या आप लोगों में से कोई बाग की हवा दरबार में ला सकता हैं?” ‘राजगुरु ने भी क्या बकवास बात कही है।’ सभी दरबारियों ने मन ही मन में सोचा और सिर झुका लिए।

यह कार्य तो बिकुल असम्भव था। “जो कोई भी बाग की हवा दरबार में लाएगा, उसे एक हजार स्वर्ण मुद्राएं इनाम में दी जाएंगी।” महाराज ने घोषणा की। इसी के साथ सभा बर्खास्त हो गई। सभी दरबारी सोच रहे थे कि यह कार्य तो बिस्कुल असम्भव है।

कोई नहीं कर सकता। हवा कोई वाहन थोड़े ही है कि उसका रुख दरबार की ओर कर दिया जाए। एकत्रित करने वाली वस्तु भी नहीं कि सुबह एकत्रित कर लें और मनचाहे समय निकालकर प्रयोग कर लें। दूसरे दिन जब दरबारी सभा में आए तो सभी उत्सुकता से एक-दूसरे की ओर देखने लगे कि शायद कोई हवा लाया हो।

उनकी सूरतें देखकर महाराज बोले: “लगता है, हमारी ये इच्छा पूर्ण नहीं होगी।” “आप निराश क्यों होते हैं महाराज।” तभी तेनालीराम अपने स्थान से उठकर बोले:’ “मेरे होते आपको तनिक भी निराश होने की आवश्यकता नहीं-मैं आपके लिए बाग की हवा को कैद करके ले आया हूं।”

उसकी बात सुनकर महाराज सहित सभी दरबारी चौंक पड़े। महाराज ने पूछा: “कहां है हवा ? उसे तुरन्त छोड़ो तेनालीराम।” तेनालीराम को तो आज्ञा मिलने की देर थी, उसने फौरन बाहर खडे पांच व्यक्तियों को भीतर बुलाया और महाराज के गिर्द घेरा डलवा दिया। उनके हाथों में खस-खस और चमेली-गुलाब के फूलों से बने बड़े-बड़े पंखे थे जो इत्र जल आदि में भीगे हुए थे।

तेनालीराम का इशारा पाते ही वे महाराज को पंखे झलने लगे। थोड़ी ही देर में पूरा दरबार महकने लगा। बड़े-बड़े पंखों की हवा होते ही महाराज को गर्मी से राहत मिली और उन्हें आनन्द आने लगा। मन ही मन में उन्होंने तेनालीराम की बुद्धि की सराहना की और बोले:

“तेनालीराम! तुम इंसान नहीं फरिश्ते हो-हर चीज हाजिर कर देते हो-इस राहत भरे कार्य के लिए हम तुम्हें एक नहीं, पांच हजार अशर्फियों का इनाम देने की घोषणा करते हैं तथा व्यवस्था मंत्री को आदेश दिया जाता है कि कल से दरबार में इसी प्रकार की हवा की व्यवस्था करे।” ये पहला मौका था जब शत्रु-मित्र सभी दरबारियों ने तेनालीराम के सम्मान में तालियां बजाईं।

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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #7
तेनालीराम का न्याय

एक बार नामदेव नामक एक व्यक्ति दरबार में आया और फरियाद की: “अन्नदाता! मुझे न्याय चाहिए अन्नदाता-मेरे मालिक ने मेरे साथ विश्वासघात किया है।” “पहले तुम अपना परिचय दो और फिर बताओ कि क्या बात है।” महाराज ने कहा।

“मेरा नाम नामदेव है अन्नदाता-परसों सुबह मेरा मालिक अपने किसी काम से हवेली से निकला, चूंकि धूप बहुत तेज थी, इसलिए उसने कहा कि मैं छतरी लेकर उसके साथ चलूं। हम दोनों अभी पंचमुखी शिव मंदिर तक ही पहुंचे थे कि धूल भरी तेज आधी चलने लगी।

हवा इतनी तेज थी कि छतरी तक संभालना भारी पड रहा था। मैंने मालिक से प्रार्थना की कि हम मंदिर के पिछवाड़े सायबान के नीचे रुक जाएं। मालिक ने मेरी बात मान ली और हम मंदिर के पिछवाड़े सायबान के नीचे जाकर खड़े हो गए।”

“फिर…।” “फिर महाराज, अचानक मेरी नजर सायबान के कोने में पड़ी लाल रंग की एक थैली पर पड़ी। मालिक से अनुमति लेकर मैंने उस पोटली को उठा लिया। खोला तो उसमें बेर के आकार के दो हीरे थे। महाराज! उन हीरों से हम दोनों की आखें चुंधिया गईं। हालांकि मंदिर में पाए जाने के कारण उन हीरों पर राज्य का अधिकार था किन्तु मेरे मालिक ने कहा कि रामदेव! तुम जुबान बंद रखने का वादा करो तो ये हीरे हम आपस में बांट लें।”

“झूठ नहीं बोलूंगा महाराज! मेरे मन में भी लालच आ गया और मैंने मालिक की बात मान ली। मैं तो अपने ही मालिक की गुलामी से तंग आ चुका था, इसलिए सोचा कि उस हीरे को बेचकर कोई काम-धंधा कर लूंगा।

मगर हवेली लौटकर मालिक ने मुझे मेरा हिस्सा देने से इन्कार कर दिया। मैं दो दिन तक उसे समझाता-बुझाता रहा, मगर वह टस से मस न हुआ, इसीलिए मुझे आपकी शरण में आना पड़ा है। हे महामहिम! आप तो साक्षात् धर्मराज हैं, अब आप ही मेरा न्याय कीजिए।”

सम्राट कृष्णदेव राय ने तुरन्त नामदेव के मालिक को दरबार में बुलवाया और पूछताछ की तो मालिक बोला : “महाराज! ये नामदेव एक नम्बर का बदमाश है, मक्कार है। महाराज! मेरे पास ईश्वर का दिया सब कुछ है।

मैंने हीरे इसे देकर कहा कि जाओ, यह राज्य की सम्पत्ति है, इसे राजकोष में जमा करवा आओ, ये दोनों हीरे लेकर चला गया, फिर दो दिन बाद मैंने इससे रसीद मांगी तो ये आनाकानी करने लगा और मेरे धमकाने पर यहां चला आया-अब आपको इसने मालूम नहीं क्या कहानी गढ़कर सुनाई होगी।”

“हूं।” महाराज ने गहरी नजरों से देखा: “क्या तुम सच कह रहे हो?” “सोलह आने सच महाराज।” “क्या वे हीरे तुमने इसे किसी के सामने दिए थे।” “मेरे तीन नौकर इस बात के गवाह हैं।” गवाहों को पेश किया गया तो उन्होंने साफ-साफ स्वीकार किया कि मालिक ने हमारे सामने नामदेव को हीरे दिए थे।

फिर महाराज ने उन सभी को वहां बैठने का आदेश दिया और स्वयं महामंत्री, सेनापति और तेनालीराम आदि के साथ विश्रामकक्ष में चले गए। “आपकी इस मामले में क्या राय है मंत्री जी ?” “मुझे तो नामदेव झूठ बोलता लग रहा है महाराज !” “किन्तु हमें वो सच बोलता लग रहा है।”

“मगर गवाहों पर भी गौर करें महाराज-गवाहों को कैसे झुठलाया जा सकता है।” महाराज ने तेनालीराम की तरफ देखा : “तुम क्या कहते हो तेनालीराम जी ?” “महाराज! आप सब लोग उस पर्दे के पीछे बैठ जाएं तो राय दूं।”

तेनालीराम की बात सुनकर महामंत्री और सेनापति दांत पीसने लगे, किन्तु महाराज को चुपचाप उठकर पर्दे के पीछे जाते देखकर उन्हें भी जाना पड़ा। अब एकांत पाकर तेनालीराम ने पहले गवाह को बुलाया: “रामदेव को तुम्हारे मालिक ने हीरे तुम्हारे सामने दिए थे ?”

“जी हां।” “हीरे कैसे थे, किस रंग के थे और उनका आकार कैसा था-चित्र बनाकर समझाओ।” तेनालीराम ने कागज कलम उसके सामने सरकाया तो वह सिटपिटा गया : “हीरे लाल थैली में बंद थे, मैंने देखे नहीं थे।” “ठीक है, खामोशी से वहां खड़े हो जाओ।” कहकर तेनालीराम ने दूसरे गवाह को बुलाया और उससे भी वैसे ही सवाल पूछे और चित्र बनानेके लिए कहा। दूसरे गवाह ने उल्टी-सीधी दो आकृतियां बनाकर रंग आदि बता दिए।

फिर उसने तीसरे को बुलाया तो उसने कहा : “हीरे भोजपत्र के कागज में लिपटे थे। आकृति और रंग तो मालूम नहीं।” सभी गवाहों ने एक-दूसरे के सामने उत्तर दिए थे। अब उनके दिल जोर-जोर से धड़क रहे थे। तभी महाराज पर्दे के पीछे से निकले और क्रोधपूर्ण नजरों से उन्हें घूरने लगे।

तीनों यह सोचकर कांप उठे कि उनका झूठ पकड़ा जा चुका है। इससे पहले कि महाराज कोई कठोर आज्ञा देते कि उन्होंने लपककर उनके पांव पकड़ लिए और गिड़गिड़ाते हुए बोले : “हमें क्षमा कर दें महाराज! हम झूठी गवाही देने पर मजबूर थे। यदि हम ऐसा न करते तो वह मक्कार हमें नौकरी से निकाल देता।”

अब सब कुछ साफ हो गया था। महाराज दरबार में आ गए। सिर झुकाए तीनों गवाह भी उनके पीछे-पीछे थे। नामदेव के मालिक के देवता कूच कर गए। महाराज ने आदेश दिया : “इस धूर्त को गिरफ्तार करके इसके घर की तलाशी ली जाए।”

हीरे बरामद हो गए। वे बड़े कीमती हीरे थे। महाराज ने हीरे तो जप्त किए ही, मालिक से दण्ड स्वरूप दस हजार स्वर्ण मुद्राएं नामदेव को दिलवाई तथा बीस हजार स्वर्ण मुद्राओं का जुर्माना भी मालिक पर किया। खुशी के मारे नामदेव दरबार में ही महाराज और तेनालीराम के जयकारे लगाने लगा। वास्तव में ही यह सब तेनालीराम की बुद्धि का कमाल था।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #8
रसगुल्ले की जड़

विजय नगर की समृद्धि का कारण वहां की व्यापार नीतियां थीं। हिन्दुस्तान में ही नहीं ईरान और बुखारा जैसे देशों से महाराज की व्यापार सन्धि थी। ऐसे ही व्यापार के सिलसिले में एक बार ईरान का व्यापारी मुबारक हुसैन विजय नगर की यात्रा पर आया।

महाराज हष्णुदेव राय ने दिल खोलकर उसका स्वागत किया, फिर सम्मान सहित उसे राजमहल में ठहराया गया। कई सेवक उसकी सेवा में तैनात कर दिए गए। रात्रि भोजन के बाद एक दिन महाराज ने हुसैन के लिए चांदी की तश्तरी भरकर रसगुल्ले भेजे।

महाराज इस इन्तजार में थे कि अभी सेवक वापस आकर कहेगा कि हुसैन को रसगुल्ले बड़े स्वादिष्ट लगे और उन्होंने इच्छा व्यक्त की है कि खाने के बाद उन्हें रोज रसगुल्ले भेजे जाएं। मगर सेवक वापस आया। रसगुल्लों से भरी तश्तरी उसके हाथों में थी। महाराज सहित सभी दरबारी उसकी सूरत देखने लगे।

सेवक ने बताया : “अन्नदाता! हुसैन ने एक भी रसगुल्ला नहीं खाया और यह कहकर वापस भेज दिया कि हमें रसगुल्लों की जड़ चाहिए।” “रसगुल्लों की जड़” महाराज एकाएक ही गम्भीर हो गए थे। अगले दिन दरबार में महाराज ने सभी दरबारियों के सामने अपनी समस्या रखी और बोले: “कितने दुख की बात होगी यदि हम हुसैन की इच्छा पूरी न कर पाए।

क्या आप लोगों में से कोई इस समस्या का समाधान कर सकता है।” दरबारी तो इसी बात से हैरान थे कि आखिर रसगुल्लों की जड़ होती क्या है, वे भला समस्या का समाधान क्या करते। हिम्मत करके पुरोहित बोला : “महाराज! ईरान में ऐसी कोई चीज होती होगी, मगर ये हिन्दुस्तान है।

हमें उसे साफ-साफ बता देना चाहिए कि रसगुल्लों की कोई जड़ नहीं होती।” “कैसे नहीं होती जी।” तभी तेनालीराम बोला: “होती है और हमारे हिन्दुस्तान में ही होती है। कितने अफसोस की बात है कि सबसे अधिक रसगुल्ले खाने वाले पुरोहित जी को रसगुल्ले की जड़ का भी पता नहीं लगा।”

राजपुरोहित किलसकर रह गए। महाराज कृष्णदेव राय ने तेनालीराम के चेहरे पर नजरें जमाकर कहा : “तेनाली! हम हुसैन के सामने शर्मिन्दा नहीं होना चाहते : तुम इसी समय कहीं से भी रसगुल्लों की जड़ लाकर हुसैन के पास भेज दो।”

तेनालीराम उठकर बोले : “मैं अभी जाता हूं महाराज और रसगुल्ले की जड़ लेकर आता हूं।” तेनालीराम चले गए और महाराज सहित सभी दरबारा उनको प्रतीक्षा में बैठे रहे। करीब एक घंटा बाद तेनालीराम वापस आया उसके हाथों में चांदी तश्तरी थी जिस पर कपड़ा ढका था। दरबारी हैरानी और उत्सुकता से उसे देखने लगे।

“महाराज! रसगुल्ले की जड हाजिर है, फौरन मेहमान की सेवा में भेजी जाए।” सारा दरबार हैरान था। सभी देखना चाहते थे कि ये क्या बला तेनालीराम उठा लाया जिसे रसगुल्ले की जड़ कह रहा है। उन्होंने उसे देखने की इच्छा जाहिर की, किन्तु तेनालीराम इंकार कर दिया : “नहीं, पहले मेहमान, बाद में कोई और।”

महाराज स्वयं रसगुल्लों की जड़ देखना चाहते थे। अत: उन्होंने एक मंत्री को आदेश दिया कि मेहमान को यहीं बुला लाएं। मंत्री स्वयं उसे लेने गया। हुसैन आ गया तो महाराज ने सेवक को इशारा किया। सेवक ने तेनालीराम के हाथ से तश्तरी लेकर मेहमान के आगे कर दी।

“यह क्या है महाराज!” हुसैन ने पूछा। “रसगुल्लों की जड़।” “वाह-वाह!” चहककर फिरदौस ने तश्तरी पर से कपड़ा हटाया और उसमें रखी वस्तु को चखते हुए बोला: “हिन्दुस्तान में यही वह चीज है जो ईरान में नहीं मिलती।”

दरबारी फटी-फटी आखों से उस वस्तु को देख रहे थे। तश्तरी में छिले हुए गन्ने के छोटे-छोटे टुकड़े थे। और उस दिन सम्राट तेनालीराम से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने अपने गले की बेशकीमती माला उतारकर उसके गले में डाल दी। हुसैन ने भी खुश होकर उन्हें एक ईरानी कालीन भेंट किया।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #9
मैं मुर्गा बाकी मुर्गियां

विजय नगर राज्य के वित्तीय नियमों के अनुसार व्यक्ति की व्यक्तिगत आय पर भी तन्यकर लगता था। जो जैसा ‘कर’ देता था, राज्य की ओर से उसे वैसी ही विशेष सुविधाएं दी जाती थीं। राजकीय प्रशस्ति में उसके नाम का उल्लेख होता था।

तेनालीराम की आय की कोई सीमा ही नहीं थी क्योंकि अपनी प्रखर बुद्धि के कारण वह पुरस्कारों आदि से बहुत सा धन कमा लेता था। इसी कारण राजकीय प्रशस्ति में उसके नाम का जिक्र सबसे ऊपर होता था। प्रधानमंत्री, सेनापति या अन्य मंत्रियों के नामों का उल्लेख उसके बाद ही होता था।

उसे सुविधाएं आदि भी इन सबसे अधिक मिलती थीं। यही कारण था कि बाकी सब लोग दिल ही दिल में उससे कुढ़ते थे। दरबार की कार्यवाही छ: दिन चलती थी। सातवें दिन महाराज बगीचों में बैठकर केवल दरबारियों की समस्याएं सुना करते थे।

उस दिन भी वह खुले दरबार में बैठे दरबारियों की समस्याएं सुनकर उन पर अपने निर्णय दे रहे थे। आज तेनालीराम अनुपस्थित था। तभी एक मंत्री ने राज्य के आयकरदाताओं की प्रशस्ति सूची महाराज के सामने रखकर कहा: “महाराज! इस सूची से स्पष्ट है कि तेनालीराम राज्य में सबसे अधिक आयकर देते हैं जबकि उनका वेतन हमसे कम है।

सोचने की बात है महाराज कि इतना धन उनके पास आता कहां से है।” “यह तो मंत्रीजी ने बड़ी अच्छी बात उठाई है अन्नदाता।” एक अन्य मंत्री बोला: “दरबार के नियमों के अनुसार-दरबार से जुड़ा कोई भी सदस्य, जो दरबार से वेतन पाता है, वह अन्य किसी तरीके से आय नहीं कर सकता-फिर तेनालीराम की इस ऊपरी आय का स्रोत क्या है ?”

राजपुरोहित भी भला ऐसे मौके पर कहां पीछे रहने वाला था, बोला : “महाराज! दरबारी नियमों का पालन न करके अतिरिक्त धन कमाने के अपराध में उसे दण्ड मिलना ही चाहिए।” बाकी बचे दरबारियों ने भी उनकी हां में हां मिलाई।

महाराज के चेहरे पर गम्भीरता के भाव दिखाई देने लगे। मंत्री, सेनापति और पुरोहित ठीक कहते हैं, मगर इसके साथ ही महाराज ये भी जानते थे कि तेनालीराम की आय के साधन वे पुरस्कार हैं जो समय-समय पर उन्हें मिलते रहते हैं, किन्तु जिन कामों पर उसे पुरस्कार मिले हैं, वे काम भी तो उसके दरबारी कर्त्तव्यों में शामिल हैं और दरबारी कर्त्तव्यों का उसे निश्चित वेतन मिलता है।

महाराज को मामला काफी उलझा हुआ लगा। सम्राट अपनी ओर से कोई तर्क इसलिए नहीं देना चाहते थे कि कहीं बाकी यबयैं ए न समझ लें कि वे तेनालीराम का पक्ष ले रहे हैं। अत: बोले : “तेनालीराम को आने दें, तभी कोई निर्णय लिया जाएगा। आखिर आरोपी को भी अपना पक्ष रखने का अधिकार है।”

फिर एक सेवक को तेनालीराम के घर भेज दिया गया। कुछ ही देर बाद उन्होंने देखा कि कंधे पर एक बड़ा सा झोला लटकाए तेनालीराम सेवक के साथ चला आ रहा है। “अन्नदाता की जय हो।” “तेनालीराम! आज तुम अभी तक कहां थे?”

“क्या बताऊं अन्नदाता!” रुआसी सी सूरत बनाकर तेनालीराम बोला: “मैं तो बड़ी दुविधा में फंस गया हूं।” कहकर उसने झोले में हाथ डाला और एक मोटा-ताजा मुर्गा बाहर निकाला। “यह क्या-मुर्गा-इसे झोले में डाले कहां घूम रहे हो ?” “महाराज! यही दुष्ट तो मेरी दुविधा का कारण है।” दुखी स्वर में तेनालीराम ने

कहा : “महाराज, आपकी दुआ से मेरे पास पन्द्रह मुर्गियां हैं और एक ये इकलौता मुर्गा है। कुल मिलाकर ये सोलह प्राणी हुए और एक छटांक प्रत्येक के हिसाब से मैं सोलह छटांक दाना रोजाना दड़बे में डालता हूं। मगर यह दुष्ट अकेला ही चार-पांच छटांक दाना गटक जाता है और मेरी मुर्गियां भूखी रह जाती हैं। महारत आप ही इसका फैसला करें और इस दुष्ट को सजा दें। “

महाराज हंस पड़े : “अरे भई तेनालीराम! इसमें भला इसका क्या दोष है। यह अधिक चुस्न-दुस्थ्य है इसलिए ये अपने हिस्से से चार-पांव गुना अधिक दाना खा जाता है, अपनी क्षमता के हिसाब से इम मिलना ही चाहिए। बल्कि दण्ड के अधिकारी तो तुम हो जो इसे इसकी शारीरिक क्षमता से कम देते हो।”

महाराज की बात सुनकर सभी दरबारियों ने उनकी हां में हां मिलाई। तेनालीराम ने मुर्गे को वापस झोले में रख लिया। “खैर! अब आप यह बताएं महाराज कि सेवक को कैसे याद किया?” महाराज ने उसे बैठने का संकेत किया, फिर आयकरदाताओं की सूची उसके सामने रखकर बोले: “तेनालीराम! तुम प्रधानमंत्री, सेनापति और पुरोहित जी से कम वेतन पाते हो, मगर आयकर इन सबसे अधिक देते हो।

हम जानना चाहते हैं कि तुम्हारी अतिरिक्त आय का स्रोत क्या है ?” तेनालीराम शान्त बैठा रहा। “महाराज!” कुछ देर बाद शांत भाव से वह बोला: “आप यूं समझें कि जैसे मेरे मुर्गे को होती है-समझ लें कि आपकी मुर्गियों में मैं अकेला मुर्गा हूं।”

तेनालीराम की बात सुनकर न केवल महाराज बल्कि दरबारी गण भी हंस पड़े। मुर्गे की मिसाल देकर तेनालीराम ने सारी बात समाप्त कर दी थी। इसी के साथ सभा समाप्त हो गई। सभी के जाने के बाद महाराज ने तेनालीराम से पूछा : “तुम्हें कैसे पता चला कि प्रधानमंत्री, सेनापति और पुरोहित ने तुम्हारे खिलाफ शिकायत की है जो तुम मुर्गा लिए चले आए ?” “इस काम के लिए आपने अपने खास सेवक को जो भेजा था।” महाराज मुस्कराकर रह गए।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #10
जाड़े की मिठाई

सर्दियों का मौसम था। महाराज, तेनालीराम और राजपुरोहित राजमहल के उद्यान में बैठे धूप सेंक रहे थे। अचानक महाराज बोले : “सर्दियों का मौसम सबसे अच्छा होता है, खूब खाओ और सेहत बनाओ।” खाने-पीने की बात सुनकर पुरोहित जी के मुंह में पानी आ गया।

वे बोले : “महाराज! सर्दियों में मेवा और मिठाई खाने का अपना अलग ही आनन्द है-वाह क्या मजा आता है।” “अच्छा बताओ।” एकाएक महाराज ने पूछा: “जाड़े की सबसे अच्छी मिठाई कौन सी है?” “एक थोड़ी है महाराज! हलवा, माल-पुए पिस्ते की बर्फी।” पुरोहित जी ने इस उम्मीद में ढेरों चीजें गिनवा दीं कि महाराज कुछ तो मंगवाएंगे ही।

महाराज ने तेनालीराम की ओर देखा : “तुम बताओ तेनालीराम-तुम्हें जाड़े के मौसम की कौन सी मिठाई पसँद है ?” “जो मिठाई मुझे पसंद है, वह यहां नहीं मिलती महाराज।” “फिर कहां मिलती है?” महाराज ने उत्सुकता से पूछा: “और उस मिठाई का नाम क्या है?”

“नाम पूछकर क्या करेंगे महाराज: आप आज रात को मेरे साथ चलें तो वह बढ़िया मिठाई मैं आपको खिलवा भी सकता हूं।” “हम अवश्य चलेंगे।” और फिर-रात होने पर वे साधारण वेश धारण करके तेनालीराम के साथ चल दिए।

चलते-चलते तीनों एक गाँव में निकल आए। गांव पार करके खेत थे। “अरे भई तेनालीराम! और कितनी दूर चलोगे?” “बस महाराज! समझिए पहुँच ही गए। वो सामने देखिए अलाव जलाए कुछ लोग जहां बैठे हैं, वहीं मिलेगी वह मिठाई।”

कुछ देर में वे वहाँ पहुँच गए जहाँ कुछ लोग अलाव जलाए बैठे हाथ ताप रहे थे। क्योंकि तीनों ने ही वेश बदला हुआ और ऊपर से अँधेरा था, इसलिए कोई उन्हे पहचान ही नहीं पाया। वे भी उन्हीं लोगों के साथ बैठकर हाथ तापने लगे।

पास ही एक कोल था जिसमें गन्तीं की पिराई चल रही थी। तेनालीराम ने उन्हें बैठाया और कोल्ड की ओर चले गए। एक ओर बड़े-बड़े कढ़ाहों में रस पक रहा था। तेनालीराम ने किसान से बात की और तीन पत्तलों में गर्मा-गर्म गुड़ ले आए।

“लो महाराज: खाओ मिठाई।” तेनाली बोला: “ये हें जाड़े को महाराज ने गर्मा-गर्म गुड खाया तो उन्हें बड़ा स्वादिष्ट लगा। “वाह! “वे बोले: “यहां अंधेरे में ये मिठाई कहां से मिली ?” “महाराज! ये हमारी धरती में पैदा होती है : क्यों पुरोहित जी! कैसी लगी गर्मा-गर्मा मिठाई ?”

राजपुरोहित ने भी कभी गर्म-गर्म बनता हुआ गुड नहीं खाया था। वे बोले : “मिठाई तो वाकई बड़ी स्वादिष्ट है।” “ये गुड़ है महाराज।” “गुड़?” महाराज चौके: “ये कैसा गुड़ है भई-गर्मा-गर्म और स्वादिष्ट।” “ये गर्मा-गर्म है, इसलिए आपको और अधिक स्वादिष्ट लग रहा है।

महाराज! वास्तव में सर्दियों की मेवा तो गर्मी है : “रसगुल्ले बड़े स्वादिष्ट होते है, मगर सर्दियों में आपको इतने स्वादिष्ट नहीं लगेंगे।” “वाह तेनालीराम-मान गए।” महाराज ने तेनालीराम की पीठ ठोंकी।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #11
रंगे हाथ पकड़े गए

यह मुहावरा सदियों से चला आ रहा है : “रंगे हाथों पकड़े जाना।” आखिर ये मुहावरा कब और कैसे बना ? हमारा खयाल है कि इस घटना के बाद ही यह बना होगा-एक दिन दरबार की कार्यवाही चल रही थी कि नगर सेठ वहां उपस्थित होकर दुहाई देने लगा : “महाराज! मैं मर गया…बरबाद हो गया-कल रात चोर मेरी तिजोरी का ताला तोड़कर सारा धन चुराकर ले गए। हाय…मैं लुट गया।”

महाराज ने तुरन्त कोतवाल को तलब किया और इस घटना के बारे में पूछा। कोतवाल ने बताया : “महाराज! हम कार्यवाही कर रहे हैं मगर चोरों का कोई सुराग नहीं मिला है।” “जैसे भी हो, वो शीघ्र ही पकड़ा जाना चाहिए।” महाराज ने कोतवाल को हिदायत देकर सेठ से कहा : “सेठ जी आप निश्चित रहे-शीघ्र ही चोर को पकड़ लिया जाएगा।”

आश्वासन पाकर सेठ चला गया। उसी रात चोरों ने एक अन्य धनवान व्यक्ति के घर चोरी कर ली। पुलिस की लाख मुस्तैदी के बाद भी चोर पकड़े न जा सके। और उसके बाद तो जैसे वहां चोरियों की बाढ़ सी आ गई। कभी कहीं चोरी हो जाती कभी कहीं।

सभी चोरियां अमीर-उमरावों के यहाँ हो रही थीं। हर बार चोर साफ बचकर निकल जाते। शिकायतें सुन-सुनकर महाराज परेशान हो उठे। उन्होंने एक दिन क्रोध में अपने दरबारियों को खूब लताड़ा : “क्या आप लोग यहां हमारी शक्ल देखने के लिए बैठे हैं-क्या कोई भी दरबारी चोर को पकड़ने की युक्ति नहीं सुझा सकता।”

सभी दरबारी चुप बैठे रहे। क्या करें ? जब कोतवाल जैसा अनुभवी व्यक्ति चोरों को नहीं पकड़ पा रहा तो कोई दरबारी भला कैसे पकड़ सकता था। किन्तु तेनालीराम को बात खटक गई। वह अपने स्थान से उठकर बोला : ” महाराज! मैं पकड़ेगा इस चोर को।”

उसी दिन तेनालीराम शहर के प्रमुख जौहरी की दुकान पर गया। उससे कुछ बातें कीं, फिर अपने घर आ गया। अगले ही दिन जौहरी की ओर से एक प्रदर्शनी की मुनादी कराई गई जिसमें वह अपने सबसे कीमती आभूषणों और हीरों को प्रदर्शित करेगा। प्रदर्शनी लगी और लोग उसे देखने के लिए टूट पड़े।

एक से बढ़कर एक कीमती हीरे और हीरों के आभूषण प्रदर्शित किए गए थे। रात को जौहरी ने सारे आभूषण व हीरे एक तिजोरी में बंद करके ताला लगा दिया जैसा कि होना ही था-रात को चोर आ धमके। ताला तोड़कर उन्होंने सारे आभूषण और हीरे एक थैली में भरे और चलते बने।

इधर चोर दुकान से बाहर निकले, उधर जौहरी ने शोर मचा दिया। देखते ही देखते पूरे क्षेत्र में जाग हो गई। चोर माल इधर-उधर डालकर लोगों की भीड़ में शामिल हो गए। मगर तभी सिपाहियों की टुकड़ी के साथ तेनालीराम वहां पहुंच गए और सिपाहियों ने पूरे क्षेत्र की नाकेबंदी कर ली।

तेनालीराम ने कहा : “सब की तलाशी लेने की आवश्यकता नहीं है, जिनके हाथ और वस्त्र रंगे हुए हैं, उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाए वे ही चोर हैं।” और इस प्रकार आनन-फानन में चोर पकड़े गए। अगले दिन उन्हें दरबार में पेश किया गया। महाराज ने देखा कि चोरों के हाथ और वस्त्र लाल रंग में रंगे हुए हैं।

“इनके हाथों पर ये रंग कैसा है तेनालीराम।” “महाराज! तिजोरी में माल रख ने से पहले उसे लाल रंग से रंगा गया था-इसी कारण इनके हाथ रंगे हुए हैं। इसी को कहते हैं, चोरी करते रंगे हाथों पकड़ना।” “वाह!” महाराज तेनालीराम की प्रशंसा किए बिना न रह सके, फिर उन्होंने चोरों को आजीवन कारावास का दण्ड सुनाया ताकि वे जीवन में फिर कभी चोरी न कर सकें।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #12
अपराधी बकरी

एक बार महाराज कृष्णदेव राय ने अपनी कश्मीर यात्रा के दौरान सुनहरी फूलवाला एक पौधा देखा। वह फूल उन्हें इतना पसंद आया कि लौटते समय उसका एक पौधा वह अपने बगीचे के लिए भी ले आए।

विजय नगर वापस आकर उन्होंने माली को बुलाया और सुनहरे फूल वाला पौधा उसे सौंपकर बोले : “इसे बगीचे में हमारे शयन कक्ष की खिड़की के ठीक सामने रोप दो। ध्यान रहे, इसकी देखभाल तुम्हें अपनी जान की भांति करनी है। यदि पौधा नष्ट हुआ तो तुम भी अपने जीवन से हाथ धो-बैठोगे।”

माली पौधा लेकर चला गया। फिर बड़ी ही सावधानी से उसने वह पौधा निश्चित स्थान पर रोप दिया। वह उसकी देखभाल भी बड़े मन से करता। नियमपूर्वक सींचता। महाराज कृष्णदेव भी सुबह- शाम उसे अपनी खिड़की से देखते। वे माली की मेहनत से संतुष्ट थे।

महाराज को तो उस पौधे से इतना लगाव हो गया था कि यदि किसी दिन उसे देखे बिना वह दरबार मैं चले जाते तो उस दिन उनका मन उखड़ा-उखड़ सा रहता। राजकाज के किसी भी कार्य में जैसे उनका मन ही नहीं लगता। एक दिन:

महाराज सोकर उठे और आदत के अनुसार उन्होंने खिड़की खोली तो यह देखकर स्तब्ध रह गए कि पौधा अपने स्थान पर नहीं था। वह परेशान हो उठे। उन्होंने फौरन माली को तलब किया। भय से थर-थर कांपता माली उनके सामने आ गया।

“पौधा कहां है?” महाराज ने गरजकर पूछा। “म…महाराज! उसे तो मेरी बकरी चर गई।” महाराज के क्रोध का ठिकाना न रहा। उनकी आखें सुर्ख हो गईं और आवेश में आकर उन्होंने माली को प्राण दण्ड दे दिया। सैनिकों ने माली को तुरन्त बंदी बना लिया।

“मूर्ख-लापरवाह-हमने कहा था कि उस पौधे की अपनी जान से भी अधिक हिफाजत करना: ऐसी हिफाजत की है-ले जाओ इसे हमारी नजरों के सामने से।” सैनिक उसे लेकर कारागार की ओर चल दिए। थोड़ा दिन चढ़ते ही यह खबर पूरे राज्य में फैल गई कि राजमाली को मृत्युदण्ड दे दिया गया है।

यह खबर माली की पत्नी तक भी पहुंची तो वह रोते-रोते राजदरबार में आई। किन्तु महाराज उस समय तक भी क्रोध में भरे बैठे थे, उन्होंने उसकी फरियाद सुनने से इकार कर दिया। अब वह अबला क्या करे ? किसी ने उसे तेनालीराम से मिलने की सलाह दी : “तुम तुरन्त तेनालीराम के पास जाओ-यदि वे चाहेंगे तो तुम्हारे पति का बाल भी बांका नहीं होगा।”

माली की पत्नी रोती-कलपती तेनालीराम के घर चल दी। वहां पहुंचकर उसने उन्हें सारी बात बताकर अपने पति के प्राणों की भीख मांगी। तेनालीराम ने सानना दी, फिर समझा-बुझाकर घर भेज दिया। अगले दिन सुबह-सुबह हम्फी में एक और हंगामा हुआ।

माली की पत्नी बकरी को मजबूत रस्सी से बांधे नगर के हर चौराहे पर जाती…खूंटा गाड़कर उसे उससे बांधती, फिर हाथ में डंडा लेकर निर्दयता से उसकी पिटाई करती। बकरी अन्तर्नाद करती, इधर-उधर कूदती-फांदती। मगर मालिन का डंडा न रुकता।

विजय नगर में पशुओं के प्रति निर्दयी व्यवहार पर प्रतिबंध था। लोग मालिन को रोकते कि वे ऐसा न करे, मगर वह किसी की न सुनती। वह तो जैसे पागल हो गई थी। उधर पिट-पिटकर बकरी भी अधमरी हो गई थी। उसके पांवों में खड़े रहने की भी शक्ति शेष न बची थी।

कुछ लोगों ने बकरी की हालत से द्रवित होकर इसकी सूचना नगर कोतवाल को दे दी। कोतवाल सिपाहियों के साथ आया और बकरी सहित मालिन को पकड़कर ले गया। कोतवाल जानता था कि यह मसला माली के मृत्युदण्ड से जुड़ा है, अत: उसने मामले को राजदरबार में पेश करना ही उचित समझा।

महाराज ने मालिन से पूछा : “क्यों तुमने इस बेजुबान को इतनी बेरहमी से पीटा।” “अन्नदाता! जिस बकरी के कारण मैं विधवा होने वाली हूं-जिसके कारण मेरे बच्चे अनाथ होने वाले हैं-जिसने मेरे भरे-पूरे घर को उजाड़कर रख दिया हो, आप ही बताएं कि उस जीव के साथ मैं कैसा व्यवहार करूं।”
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #13
बाढ़ पीड़ित फंड

एक बार विजय नगर राज्य में भयंकर वर्षा हुई जिसके कारण पूरे राज्य में बाढ़ आ गई जिसने तबाही मचा डाली। अनेकों घर पानी में बह गए। हजारों पशु बाढ़ की भेंट चढ़ गए।

इस विपदा की खबर राजा कृष्णदेव राय को मिली तो उन्होंने तुरन्त मंत्री को बुलाकर आदेश दिया: “तुरन्त बाढ़ पीड़ितों की सहायता की जाए। उनकी चिकित्सा, खाने और रहने की व्यवस्था की जाए और इस कार्य के लिए जितने भी धन की आवश्यकता हो, वह राजकोष से अविलम्ब ले लिया जाए।

नदी नालों पर पुल बनाएं जाएं तथा उसी प्रकार की और दूसरी व्यवस्था की जाए जिससे प्रजा को राहत मिले।” मंत्री ने महाराज को आश्वासन दिया और राजकोष से तुरन्त भारी रकम निकलवाकर सहायता के कार्य में जुट गया। उस दिन के बाद से कई हफ्तों तक मंत्री जी राजधानी में दिखाई न दिए।

महाराज व दूसरे लोग आश्वस्त थे कि मंत्री जी जोर-शोर से राहत कार्यों में जुटे हैं। उधर तेनालीराम भी अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं थे। करीब एक महीने बाद प्राकृतिक आपदा राहत मंत्री दरबार में पधारे और महाराज को राहत कार्य की रिपोर्ट देने लगे। अपने काम की उन्होंने खूब बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा की।

जब दरबार की कार्यवाही समाप्त हो गई तो सभी के जाने के बाद महाराज ने तेनालीराम से कहा: “तेनालीराम! यह मंत्री काफी कर्मठ हैं। एक माह में ही बाढ़-पीड़ितों के दुख-दर्द दूर कर दिए।” “आप ठीक कहते हैं महाराज-क्यों न एक बार आप भी चलकर देख लें कि मंत्री जी ने कैसे और क्या-क्या प्रबंध किए हैं-प्रजा आपको अपने बीच देखेगी तो उनका काफी मनोबल बढ़ेगा।”

“बात तो तुम्हारी ठीक है।” महाराज ने फौरन सहमति दे दी। अगले ही दिन महाराज कृष्णदेव राय और तेनालीराम अपने-अपने घोड़ों पर सवार होकर बाढ़ग्रस्त क्षेत्र की ओर निकल गए। रास्ते में राजा का बाग था। उन्होंने देखा कि बाग के बहुत से कीमती वृक्ष कटे हुए हैं।

“ये पेड़ किसने काटे हैं।” “महाराज! या तो तेज हवा से टूट गए होंगे या बाढ़ बहाकर ले गई होगी।” चलते-चलते वे एक नाले पर जा पहुंचे। उस स्थान पर पुल के नाम पर कटे हुए पेड़ों के दो तने रखे थे। “अरे! क्या इस मंत्री के बच्चे ने ऐसे ही पुल बनाए हैं। ये तने तो शाही बाग के पेड़ों के लगते हैं।”

“महाराज! हो सकता है कि ये तने बाढ़ के पानी में बहकर स्वयं ही यहां आकर अटक गए हों। आगे चलिए आगे अवश्य ही मंत्री जी ने अच्छे पुलों का निर्माण कराया होगा।” मगर सभी जगह वही हाल था। वे जैसे-तैसे एक गांव में जा पहुंचे। गांव का बहुत-सा भाग अभी खे पानी में डूबा हुआ था।

जिस स्थान से बाढ़ का पानी निकल गया था, वहां गंदगी फैली थी। जगह-जगह मरे हुए जानवर सड़ रहे थे। जिसके कारण ऐसी दुर्गंध फैली हुई थी कि सांस लेना भी दूभर हो रहा था। लोग अभी तक पेड़ों पर मचान बनाकर रह रहे थे। खाने की कौन कहे, पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं थी।

यह सब देखकर महाराज का खून खौल रहा था। उधर, तेनालीराम अलग आग में घी डाल रहे थे। “देखिए महाराज! मंत्री जी ने इन लोगों को सदा के लिए पेड़ों पर बसा दिया है, अब चाहे कितनी भी बाढ़ आए इनका पांव भी गीला नहीं होगा। इससे बेहतर राहत कार्य और भला क्या हो सकता है।”

“तेनालीराम-तुमने यहां लाकर हमारी औखें खोल दीं। इस मंत्री को हम ऐसा दण्ड देंगे कि जीवन भर याद रखेगा। चलो, तुरन्त वापस चलो।” दूसरे दिन दरबार लगा, महाराज ने अपना आसन ग्रहण करते ही मंत्री को आड़े हाथों लिया और खूब फटकार लगाई, फिर बोले: “राजकोष से जितना पैसा तुमने लिया है, अब उससे दोगुना तुम्हें इस कार्य पर खर्च करना होगा और इस काम में खर्च होने वाली एक-एक पाई का हिसाब तेनालीराम रखेंगे।” महाराज का यह आदेश सुनते ही मंत्री महोदय का चेहरा लटक गया।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #14
उबासी की सजा

एक दिन तेनालीराम को संदेश मिला कि रानी तिरुमलादेवी इस समय बड़े संकट में हैं और आपसे मिलना चाहती हैं। तेनालीराम तुरन्त रानी जी से मिलने गए। “रानी जी! कैसे याद किया सेवक को ?” “तेनालीराम जी! हम एक भारी मुसीबत में फंस गए हैं।”

“मेरे होते आप किसी प्रकार की चिन्ता न करें और मुझे बताएं कि क्या बात है।” दिलासा पाकर रानी की औखें भर आईं। वे बोलीं: “बात दरअसल ये है कि महाराज हमसे काफी नाराज हैं।” “किन्तु क्यों ? क्या हुआ था ?” “एक दिन वह हमें अपना एक नाटक पढ़कर सुना रहे थे कि हमें उबासी आ गई, बस इसी बात पर महाराज नाराज होकर चले गए।

तब से आज तक कई दिन हो गए हैं, महाराज ने इस तरफ का रुख ही नहीं किया। हालांकि इसमें मेरा कोई दोष नहीं था, फिर भी मैंने महाराज से माफी मांगी, पर महाराज पर कोई असर नहीं हुआ। अब तो तुम्हीं हमारी इस समस्या को हल कर सकते हो तेनालीराम।”

“आप किसी प्रकार की चिन्ता न करें। मैं अपनी ओर से पूरा प्रयास करूँगा।” महारानी को ढांढस बंधाकर तेनालीराम दरबार में जा पहुंचे। महाराज स्थ्य रेठे राज्य में चावल की खेती पर मंत्रियों से चर्चा कर रहे थे। “चावल की उपज बढ़ाना बहुत आवश्यक है।”

महाराज कह रहे थे: “हमने बहुत प्रयत्न किए। हमारे प्रयत्नों से स्थिति में सुधार तो हुआ है, लेकिन समस्या पूरी तरह सुलझी नहीं है।” “महाराज!” तभी तेनालीराम ने चावल के बीजों में से एक-एक बीज उठाकर कहा: “यदि इस किस्म का बीज बोया जाए तो इस साल उपज दुगनी-तिगुनी हो सकती है।”

“अच्छा-क्या इस किस्म का बीज इसी खाद में हो जाएगा ?” “हां महाराज! किसी प्रकार का और दूसरा प्रयत्न करने की आवश्यकता ही नहीं है किन्तु…।” “किन्तु क्या तेनालीराम।” “इसे बोने, सींचने और काटने वाला व्यक्ति ऐसा हो जिसे जीवन में कभी उबासी न आई हो और न कभी आए।”

“तेनालीराम! तुम्हारे जैसा मूर्ख मैंने आज तक नहीं देखा।” महाराज चिढ़ से गए: “क्या संसार में ऐसा कोई व्यक्ति है जिसे कभी उबासी न आई हो।” “ओह! क्षमा करें महाराज! मुझे नहीं मालूम था कि उबासी सभी को आती है: मैं ही क्या, महारानी जी भी यही समझती हैं कि उबासीदृआना बहुत बड़ा जुर्म है: मैं अभी जाकर महारानी जी को भी बताता हूं।”

अब महाराज की समझ में पूरी बात आ गई। वे समझ गए कि हमें रास्ते पर लाने के लिए ही तेनालीराम ने ऐसा कहा है। वे बोले: “मैं स्वयं जाकर महारानी को बता दूंगा।” महाराज तुरन्त महल में जाकर रानी जी से मिले और उनके सभी शिकवे समाप्त कर दिए।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #15
आधा हिस्सा

एक बार नृत्य और संगीत का एक प्रसिद्ध कलाकार विजय नगर में आया। महाराज ने रानियों के देखने के लिए नृत्य दिखाए जाने का विशेष प्रबंध किया और सभी को यह आदेश दे दिया कि तेनालीराम को इस सम्बंध में कुछ न बताया जाए।

इधर, जब तेनालीराम को इस विशेष आयोजन का पता चला तो वे भी राजमहल की ओर चल दिए। किन्तु द्वारपाल ने उन्हें बाहर ही रोक लिया: “महाराज की आज्ञा है कि आपको भीतर प्रवेश न दिया जाए। क्षमा करें।”

“किन्तु मुझे पता चला है कि महाराज की ऐसी कोई आज्ञा नहीं है: देखो, तुम भीतर जाने दो। वहां से मुझे जो इनाम मिलेगा, उसमें से आधा तुम्हारा।” तेनालीराम ने द्वारपाल को लालच दिया। पहले तो द्वारपाल हिचकिचाया, फिर सोचा, ‘यदि बैठे-बिठाए आधा इनाम मिल जाए तो क्या बुराई है।’

“ठीक है, लेकिन ध्यान रहे, जो कुछ मिलेगा, उसका आधा हिस्सा मैं लूंगा।” “ठीक है वादा रहा।” कहकर वह उस द्वार से भीतर आ गया। अब दूसरा द्वार पार करना था। वहां भी द्वारपाल ने उसे रोका। तब तेनालीराम बोला: “देखो, मुझे भीतर जाने दो, जो कुछ भी मुझे मिलेगा, उसका आधा हिस्सा तो बाहर का द्वारपाल ले लेगा-बाकी आधा तुम ले लेना।”

“क्या बाहर वाले द्वारपाल से ऐसी शर्त तय हुई है ?” “हां भई, तभी तो यहां तक पहुंचा हूं।” “ठीक है-मगर अपने कौल से मुकरना मत।” “ये तेनालीराम का वादा है भाई-हमारे वादे पर तो महाराज भी विश्वास कर लेते हैं।” इस प्रकार उसे तसल्ली देकर तेनालीराम भीतर आ गए।

वहां नाटक मण्डली द्वारा नृत्य और संगीत के माध्यम से कृष्ण की बाल लीला का मंचन हो रहा था। माखन चोरी, गोपियों की छेड़छाड़, सभी कुछ गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया जा रहा था। एक व्यक्ति कृष्ण बना था। अचानक तेनालीराम को न जाने क्या सूझा कि पास ही पड़ा एक डंडा उठाकर कृष्ण बने कलाकार के सिर पर दे मारा।

दर्द के मारे कलाकार चिल्लाने लगा। “अरे महाशय! कृष्ण ने तो गोपियों और ग्वालबालों से न जाने कितनी चोटें खाई और उफ तक भी की- आपको भी इस मामूली प्रहार पर नहीं चिल्लाना चाहिए।” लेकिन कलाकार पर तेनालीराम की बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह अपना सिर थाम कर ददँ से चिल्लाता रहा।

ये देखकर महाराज को क्रोध आ गया। उन्होंने तुरन्त एक पुलिस अधिकारी को बुलाकर कहा: “हमसे लगातार प्रशंसा और उपहार पाकर इसका दिमाग खराब हो गया है। आज इसे कुछ और ही इनाम दिया जाए। हमारी आज्ञा है कि इनाम में इसे दो सौ कोई मोर जाएं।”

पुलिस अधिकारी ने फौरन तेनालीराम को थाम लिया और चला यातनाग्रह की ओर। “ठहरिए महाराज! महाराज ने मुझे जो इनाम दिया है वह सिर आखों पर। किन्तु मेरा इनाम कुछ अन्य लोगों को बांट दिया जाए।” “क्या मतलब?” महाराज ने भी उसकी बात सुन ली थी: “कोतवाल साहब! इसे इधर लाओ।” कोतवाल उसे महाराज के सम्मुख ले गया।

“अरे मूर्ख! तुझे इनाम में दो सौ कोड़े प्राप्त हुए हैं।” आश्चर्य से महाराज ने पूछा: “क्या हमारे राज्य में ऐसा भी मूर्खकोई है जो यह इनाम लेना चाहेगा ?” “इस प्रकार के दो व्यक्ति तो आपके राजदरबार में ही हैं महाराज!” तेनालीराम ने बताया: “वे दोनों बाहर के द्वारपाल हैं।

उन्होंने इसी शर्त पर मुझे अन्दर आने दिया था कि हमें जो कुछ भी पुरस्कार प्राप्त होगा, वे दोनों आधा-आधा बांट लेंगे।” महाराज ने तुरन्त द्वारपालों को बुलवाया। पूछताछ में तेनालीराम की बात सच निकली। महाराज की आज्ञा से उन लालचियों को न केवल सौ-सौ कोड़े मारे गए बल्कि नौकरी से भी हटा दिया गया।

“महाराज! हमें इन कलाकारों के साथ-साथ अपने दरबार और राज्य के लालची कलाकारों का भी नाटक-कभी-कभी देखना चाहिए।” महाराज ने खुश होकर तेनालीराम की पीठ ठोंकी और अपनी बगल में बैठाया। कलाकार पुन: अपनी प्रस्तुति देने लगे।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #16
अपमान का बदला

बात उन दिनों की है जब तेनालीराम का विजय नगर के राजदरबार से कोई लेना-देना नहीं था। उन दिनों वे सोचा करते थे कि किसी प्रकार महाराज तक अपनी पहुंच बनाई जाए। मगर ये आसान नहीं था। इसी अभिलाषा को लेकर उन्होंने राज-गुरु तक अपनी पहुंच बनाई और उनकी बहुत सेवा की, मगर राजगुरु भी अपने किस्म का अकेला ही घाघ था।

वह तेनालीराम से अपने सारे काम करवा लेता, मगर राजमहल की बात आती तो टाल जाता। इससे तेनालीराम काफी उखड़ा हुआ था। वह उसकी फितरत समझ गया कि इसने कभी मुझे महाराज तक नहीं पहुंचने देना है। अत: एक दिन उसने उसे सबक सिखाने का मन बना लिया।

एक बार राजगुरु नदी पर नहाने गया। किनारे पर जाकर उसने वस्त्र उतारे और पानी में उतर गया। तेनालीराम उसके पीछे-पीछे था। वह वृक्ष की ओट में छिप गया और जैसे ही राजगुरु ने नाक बंद करके पानी में गोता लगाया, वैसे ही उसने उसके कपड़े उठा लिए और जाकर पेड़ के पीछे छिप गया।

कुछ देर बाद जब राजगुरु नहाकर किनारे की ओर बढ़ा तो अपने कपड़े वहां न पाकर ठिठक गया। “अरे यह कौन है?” वह चिल्लाया: “मेरे वस्त्र किसने उठाए हैं? ओह! रामलिंग…मैंने तुम्हें देख लिया है उस वृक्ष के पीछे…अरे भई मजाक छोड़ो और मेरे वस्त्र दो… देखो, मैं तुम्हें महाराज तक अवश्य पहुंचाऊंगा।”

तेनालीराम का असली नाम रामलिंग ही था। बाद में अपनी ननिहाल तेनाली में होने के कारण वह तेनालीराम कहलाए क्योंकि बचपन से लेकर जवानी तक का उनका समय अपनी ननिहाल में ही बीता था। “तुम झूठे हो राजगुरु! आज तक तुम मुझे झूठे दिलासे देते रहे हो।” वह बाहर आ गया।

“इस बार मैं पक्का वादा करता हूं।” “वादा करो कि तुम मुझे कंधे पर बैठाकर इसी समय राजमहल लेकर चलोगे।” “कंधे पर बैठाकर?” राजगुरु क्रोधित हो उठा: “तुम पागल तो नहीं हो गए रामलिंग।” “हां, तुम्हारे झूठे आश्वासन पा-पाकर पागल ही हो गया हूं। बोलो, मेरी शर्त मंजूर है तो बोलो, वरना मैं चला अपने रास्ते पर।”

“अरे नहीं-नहीं-मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है।” हथियार डालते हुए राजगुरु बोला: “लाओ मेरे वस्त्र दो।” तेनालीराम ने उसके वस्त्र दे दिए। राजगुरु ने बाहर आकर जल्दी-जल्दी वस्त्र पहने, फिर उसे अपने कंधों पर बैठाकर महल की ओर चल दिया।

जब राजगुरु नगर में पहुंचा तो लोग यह विचित्र दृश्य देखकर हैरान रह गए। लड़के सीटियां और तालियां बजाते उनके पीछे-पीछे चलने लगे। चारों ओर शोर मच गया: “राजगुरु का जुलूस-देखो राजगुरु का जुलूस।” राजगुरु अपने आपको ऐसा अपमानित महसूस कर रहा था, जैसे भरे बाजार में वह नंगा चला जा रहा हो।

धीरे-धीरे ये काफिला राजमहल के करीब पहुंच गया। महाराज अपने कक्ष में बैठे थे। शोर सुनकर वे बाहर बरामदे में आए फिर बुर्ज में आकर नीचे का नजारा देखने लगे। उन्होंने देखा कि राजगुरु एक व्यक्ति को कंधे पर उठाए लिए चले आ रहे हैं, लज्जा से उनका सिर झुका हुआ है और शरीर पसीने-पसीने हो रहा है। पीछे आते लोग उनका मजाक उड़ा रहे हैं और कंधे परं बैठा व्यक्ति हंस रहा है।

राजगुरु का ऐसा अपमान देखकर महाराज को बेहद क्रोध आया। उन्होंने अपने दो अंगरक्षकों को आदेश दिया कि जो व्यक्ति दूसरे के कधों पर बैठा है, उसे नीचे गिरा दो और मुक्कों लातों से खूब पिटाई करके छोड़ दो। मगर दूसरे व्यक्ति को सम्मान सहित हमारे पास ले आओ।

राजगुरु तो महाराज को नहीं देख पाया, मगर तेनालीराम ने देख लिया कि उनकी ओर इशारा करके महाराज अपने अंगरक्षकों से कुछ कह रहे हैं। बस तेनालीराम को समझते देर नहीं लगी कि दाल में कुछ काला है। वह झट राजगुरु के कंधे से उतरा और क्षमा मांगने लगा।

क्षमा-याचना करके उसने राजगुरु को अपने कंधे पर उठा लिया और उनकी जय-जयकार करने लगा। तभी राजा के अंगरक्षक वहां आए। उन्होंने राजगुरु को तेनालीराम के कंधे से नीचे गिरा लिया और बुरी तरह उनकी पिटाई करने लगे। बेचारा राजगुरु पीड़ा अएएर अपमान से चीखने लगा। सैनिकों ने उसकी खूब पिटाई की, फिर तेनालीराम से बोले: “आइए, आपको महाराज ने बुलाया है।”

राजगुरु हैरान था कि यह सब क्या हुआ। अंगरक्षक तेनालीराम को लेकर महाराज के पास पहुंचे तो उसे देखकर महाराज भी बौखलाए: “यह किसे ले आए। हमने कहा था कि ऊपर वाले की पिटाई करें और नीचे वाले को ले आएं।” “ये नीचे वाले ही हैं महाराज! वो पाजी इनके कंधों पर बैठा था।”

“ओह! इसका मतलब यह व्यक्ति बहुत चालाक है। इसने पहले ही अंदाजा लगा लिया था कि क्या हो सकता है। इसे ले जाकर मौत के घाट उतार दो। इसने राजगुरु का अपमान किया है।” क्रोधावेग में महाराज बोले जा रहे थे: “और हां, इसके खून से सनी तलवार सरदार को दिखा देना।”

उस समय तक वहां कुछ दरबारी भी आ गए थे। वे ऊपर से तो गंभीर थे, लेकिन मन ही मन में खुश हो रहे थे कि इस युवक ने राजगुरु की अच्छी दुर्गति की। जब सैनिक तेनालीराम को लेकर चले तो कुछ दरबारी खामोशी से उसके पीछे हो लिए। एक स्थान पर जाकर उन्होंने असली कारण पूछा तो उन्हें लगा कि तेनालीराम निर्दोष है।

उसे किसी प्रकार राजदरबार में लाया जाए ताकि उन्हें राजगुरु और दूसरे बेइमान दरबारियों को सबक सिखाने का अवसर मिले। उन्होंने तेनालीराम से दोनों सैनिकों को दस-दस स्वर्ण मुद्राएं दिलवा कर और इस वादे के साथ उसे छुड़वा लिया कि वह शहर छोड़कर चला जाएगा।

सिपाहियों ने तबेले में जाकर एक बकरे को हलाल करके अपनी खून से रंगी तलवारें सरदार को दिखा दीं। तेनालीराम को जहां जान बचने की खुशी थी, वहीं बीस स्वर्ण मुद्राओं के जाने का दुख भी था। मगर वह भी इस प्रकार चुप बैठने वाला नहीं था। उसने अपने घर जाकर अपनी मां और पत्नी को सिखा-पढ़ाकर महल में भेज दिया।

दोनों सास-बहू महाराज के पास जाकर फूट-फूटकर रोने लगीं। “क्या बात है ? तुम कौन हो और यहां आकर इस प्रकार क्यों रो रही हो ?” “महाराज! एक छोटे से अपराध के, लिए आपने मेरे बेटे रामलिंग को मृत्युदण्ड दे दिया। उसके इस दुनिया से चले जाने के बाद अब मैं किसके सहारे जीऊंगी कौन होगा मेरे बुढ़ापेका सहारा ?” कहकर उसकी मां सिसक-सिसक कर रोने लगी।

“और मेरे इन मासूम बच्चों का क्या होगा महाराज: मैं अबला इन बच्चों और इस बूढ़ी सास का पेट कैसे पालूंगी।” महाराज को फौरन अपनी गलतीका एहसास हुआ कि उस छोटी सी भूल की उसे इतनी बड़ी सजा नहीं देनी चाहिए थी। अब हो भी क्या सकता था।

उन्होंने आज्ञा दी : “इन्हें हर माह दस स्वर्ण मुद्राएं दी जाएं जिससे ये अपना व बच्चों का पेट पाल सकें।” दस स्वर्ण मुद्राएं तत्काल? लेकर दोनों सास-बहू घर पहुंचीं और तेनालीराम को पूरी बात बताई। तेनालीराम खूब हसा : “चलो, दस स्वर्ण मुद्राएं अगले माह मिल जाएंगी-हिसाब बराबर।”
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #17
सबक

एक बार विजय नगर में ऐसी भीषण गर्मी पड़ी कि नगर के सभी बाग-बगीचे सूख गए। नदियों और तालाबों का जल स्तर घट गया। तेनालीराम के घर के पिछवाड़े भी एक बड़ा बाग था, जो सूखता जा रहा था ? उसके बाग में एक कुआ था तो सही, मगर उसका पानी इतना नीचे चला गया था कि दो बाल्टी जल खींचने में ही नानी याद आ जाए।

तेनालीराम को बाग की चिन्ता सताने लगी। एक शाम तेनालीराम अपने बेटे के साथ बाग का निरीक्षण कर रहा था और सोच रहा था कि सिंचाई के लिए मजदूर को लगाया जाए या नहीं, कि तभी उसकी नजर तीन-चार व्यक्तियों पर पड़ी जो सड़क के दूसरी पार एक वृक्ष के नीचे खड़े उसके मकान की ओर देख रहे थे। फिर एक-दूसरे से इशारे कर-करके वे कुछ कहने भी लगे।

तेनालीराम को समझते देर नहीं लगी कि ये .धमार हैं और चोरी करने के इरादे से ही उसके मकान का मुआयना कर रहे हैं। तेनालीराम के मस्तिष्क में बाग की सिंचाई की तुरन्त एक युक्ति आ गई। उसने ऊंची आवाज में अपने पुत्र से कहा : “बेटे! सूखे के दिन हैं।

चोर-डाकू बहुत घूम रहे हैं। गहनों और अशर्फियों का वह संदूक घर में रखना ठीक नहीं-आओ, उस संदूक को उठाकर इस कुएं में डाल दें, ताकि कोई चुरा न सके। आखिर किसे पता चलेगा कि तेनालीराम का सारा धन इस कुएं में पड़ा है।” यह बात तेनालीराम ने इतनी जोर से कही, जिससे दूर खड़े चोर भी स्पष्ट सुन लें।

अपनी बात कहकर तेनालीराम ने बेटे का हाथ पकड़ा और मकान के भीतर चला गया। मन ही मन में वह कह रहा था: ‘आज इन चोरों को ढंग का कुछ काम करने का मौका मिलेगा। अपने बाग की सिंचाई भी हो जाएगी।’ बाप-बेटे ने मिलकर एक सन्दूक में कंकर-पत्थर भरे और उसे उठीकर बाहर लाए फिर कुएं में फेंक दिया।

‘छपाक’ की तेज आवाज के साथ ट्रंक पानी में चला गया। तेनालीराम फिर ऊंचे स्वर में बोला : “अब हमारा धन सुरक्षित है।” उधर घर के पिछवाड़े खड़े चोर मन ही मन मुस्कराए। “लोग तो व्यर्थ ही तेनालीराम को चतुर कहते हैं। यह तो निरा मूर्ख है। इतना भी नहीं जानता कि दीवारों के भी कान होते हैं।” एक चोर ने अपने साथी से कहा:

“आओ चलें, आज रात इसका सारा खजाना हमारे कब्जे में होगा।” तेनालीराम अपने घर में चले गए और चोर अपने रास्ते। रात हुई। चोर आए और अपने काम में जुट गए। वे बाल्टी भर-भर कुएं से पानी निकलते और धरती पर उड़ेल देते। उधर, तेनालीराम और उसका पुत्र पानी को क्यारियों की और करने के लिए खुरपी से नालियां बनाने लगे।

उन्हें पानी निकालते-निकालते सुबह के चार बज गए, तब कहीं जाकर संदूक का एक कोना दिखाई दिया। वस, फिर क्या था, उन्होंने कांटा डालकर संदूक बाहर खींचा और जल्दी से उसे खोला तो यह देखकर हक्के-बक्के रह गए कि उसमें पत्थर भरे थे।

अब तो चोर सिर पर पैर रखकर भागे कि मूर्ख तो बन ही चुके हैं, अब कहीं पकड़े न जाएं। दूसरे दिन जब तेनालीराम ने यह बात महाराज को बताई तो वे खूब हंसे और बोले: “कभी-कभी ऐसा भी होता है कि मेहनत तो कोई करता है और फल कोई और ही खाता है।”
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #18
अपराधी बकरी

एक बार महाराज कृष्णदेव राय ने अपनी कश्मीर यात्रा के दौरान सुनहरी फूलवाला एक पौधा देखा। वह फूल उन्हें इतना पसंद आया कि लौटते समय उसका एक पौधा वह अपने बगीचे के लिए भी ले आए।

विजय नगर वापस आकर उन्होंने माली को बुलाया और सुनहरे फूल वाला पौधा उसे सौंपकर बोले : “इसे बगीचे में हमारे शयन कक्ष की खिड़की के ठीक सामने रोप दो। ध्यान रहे, इसकी देखभाल तुम्हें अपनी जान की भांति करनी है। यदि पौधा नष्ट हुआ तो तुम भी अपने जीवन से हाथ धो-बैठोगे।”

माली पौधा लेकर चला गया। फिर बड़ी ही सावधानी से उसने वह पौधा निश्चित स्थान पर रोप दिया। वह उसकी देखभाल भी बड़े मन से करता। नियमपूर्वक सींचता। महाराज कृष्णदेव भी सुबह- शाम उसे अपनी खिड़की से देखते। वे माली की मेहनत से संतुष्ट थे।

महाराज को तो उस पौधे से इतना लगाव हो गया था कि यदि किसी दिन उसे देखे बिना वह दरबार मैं चले जाते तो उस दिन उनका मन उखड़ा-उखड़ सा रहता। राजकाज के किसी भी कार्य में जैसे उनका मन ही नहीं लगता। एक दिन:

महाराज सोकर उठे और आदत के अनुसार उन्होंने खिड़की खोली तो यह देखकर स्तब्ध रह गए कि पौधा अपने स्थान पर नहीं था। वह परेशान हो उठे। उन्होंने फौरन माली को तलब किया। भय से थर-थर कांपता माली उनके सामने आ गया।

“पौधा कहां है?” महाराज ने गरजकर पूछा। “म…महाराज! उसे तो मेरी बकरी चर गई।” महाराज के क्रोध का ठिकाना न रहा। उनकी आखें सुर्ख हो गईं और आवेश में आकर उन्होंने माली को प्राण दण्ड दे दिया। सैनिकों ने माली को तुरन्त बंदी बना लिया।

“मूर्ख-लापरवाह-हमने कहा था कि उस पौधे की अपनी जान से भी अधिक हिफाजत करना: ऐसी हिफाजत की है-ले जाओ इसे हमारी नजरों के सामने से।” सैनिक उसे लेकर कारागार की ओर चल दिए। थोड़ा दिन चढ़ते ही यह खबर पूरे राज्य में फैल गई कि राजमाली को मृत्युदण्ड दे दिया गया है।

यह खबर माली की पत्नी तक भी पहुंची तो वह रोते-रोते राजदरबार में आई। किन्तु महाराज उस समय तक भी क्रोध में भरे बैठे थे, उन्होंने उसकी फरियाद सुनने से इकार कर दिया। अब वह अबला क्या करे ? किसी ने उसे तेनालीराम से मिलने की सलाह दी : “तुम तुरन्त तेनालीराम के पास जाओ-यदि वे चाहेंगे तो तुम्हारे पति का बाल भी बांका नहीं होगा।”

माली की पत्नी रोती-कलपती तेनालीराम के घर चल दी। वहां पहुंचकर उसने उन्हें सारी बात बताकर अपने पति के प्राणों की भीख मांगी। तेनालीराम ने सानना दी, फिर समझा-बुझाकर घर भेज दिया। अगले दिन सुबह-सुबह हम्फी में एक और हंगामा हुआ।

माली की पत्नी बकरी को मजबूत रस्सी से बांधे नगर के हर चौराहे पर जाती…खूंटा गाड़कर उसे उससे बांधती, फिर हाथ में डंडा लेकर निर्दयता से उसकी पिटाई करती। बकरी अन्तर्नाद करती, इधर-उधर कूदती-फांदती। मगर मालिन का डंडा न रुकता।

विजय नगर में पशुओं के प्रति निर्दयी व्यवहार पर प्रतिबंध था। लोग मालिन को रोकते कि वे ऐसा न करे, मगर वह किसी की न सुनती। वह तो जैसे पागल हो गई थी। उधर पिट-पिटकर बकरी भी अधमरी हो गई थी। उसके पांवों में खड़े रहने की भी शक्ति शेष न बची थी।

कुछ लोगों ने बकरी की हालत से द्रवित होकर इसकी सूचना नगर कोतवाल को दे दी। कोतवाल सिपाहियों के साथ आया और बकरी सहित मालिन को पकड़कर ले गया। कोतवाल जानता था कि यह मसला माली के मृत्युदण्ड से जुड़ा है, अत: उसने मामले को राजदरबार में पेश करना ही उचित समझा।

महाराज ने मालिन से पूछा : “क्यों तुमने इस बेजुबान को इतनी बेरहमी से पीटा।” “अन्नदाता! जिस बकरी के कारण मैं विधवा होने वाली हूं-जिसके कारण मेरे बच्चे अनाथ होने वाले हैं-जिसने मेरे भरे-पूरे घर को उजाड़कर रख दिया हो, आप ही बताएं कि उस जीव के साथ मैं कैसा व्यवहार करूं।”

“क्या मतलब?” उलझनपूर्ण लहजे में महाराज ने पूछा : “इस निरीह पशु के कारण तुम विधवा हो रही हो। तुम्हारे बच्चे अनाथ हो रहे हैं-यह बात कुछ समझ में नहीं आई-विस्तार से बताओ।” “महाराज!” माली की पत्नी हाथ जोड़कर बोली : “क्षमा करें, यह वही बकरी है जिसने आपका सुनहरी फूल वाला पौधा खाया है : अपराध इसने किया है, मगर सजा मेरे पति को मिल रही है-फूल इसने खाया और घर मेरा उजड़ रहा है।

मांग मेरी सूनी हो रही है : अब आप ही बताएं कि आप जैसे न्यायशील राजा के राज्य में कोई इतना भयंकर अपराध करके भी सजा से बचा रहे, क्या यह उचित है : आखिर इसे इसके अपराध का दण्ड मिलना चाहिए कि नहीं ?”

“ओह- ओह!” महाराज उसकी बात सुनकर सब कुछ समझ गए। मगर उनके चेहरे पर यह सोचकर आश्चर्य के चिन्ह उभर आए कि एक मामूली औरत इतनी बड़ी और सूझ-बूझ वाली बात कर रही है। ‘नहीं, इसके पीछे अवश्य ही किसी और का दिमाग है।’

“हम तुम्हारे पति का दण्ड माफ करते हैं, किन्तु सच-सच बताओं कि यह सारा नाटक तुमने किसके कहने पर किया है ?” “जी, तेनालीराम जी के।” “ओह तेनालीराम…तुम बड़े अजीब-अजीब तरीके अपनाकर हमारा ध्यान हमारे गलत निर्णयों की ओर आकर्षित करते हो।” महाराज ने उसी समय तेनालीराम को पांच सौ स्वर्ण मुद्राएं पुरस्कार देने का ऐलान किया और उस निर्दोष माली की फांसी की सजा को भी स्थगित कर दिया।

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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #19
बैठो पीठ पर

एक दिन महाराज कृष्णदेव राय की अंगूठी का बहुमूल्य हीरा महल में ही कहीं खो गया। महाराज बहुत परेशान हुए। उन्होंने तुरन्त महल के सेवकों और सैनिकों को हीरा खोने की बात बताई और आदेश दिया कि हीरा ढूंढने के लिए महल का कोना-कोना छान मारें।

सैनिक-सेवक महल में हीरा तलाशने में जुट गए। वह हीरा महाराज को किसी पहुंचे हुए संत ने दिया था और कहा था कि जब तक यह हीरा तुम्हारे पास रहेगा, तुम शत्रुओं पर विन्धमाते रही, मगर आज हीरा खो गया तो महाराज के मस्तिष्क में तरह-तरह की शंकाएं उभरने लगीं।

दोपहर तक जब हीरा न मिला तो उन्होंने बेचैन होकर घोषणा कर दी कि जो भी उस हीरे को ढूंढकर लाएगा, उसे मुंह मांगा पुरस्कार दिया जाएगा। महल में हीरे की खोज तो चल ही रही थी। संयोग से हीरा महल के जमादार को मिल गया।

महाराज की तब कहीं जाकर सांस में सांस आई। उन्होंने जमादार से कहा : “मांगो, क्या मांगते हो, हम तुम्हें मुंह मांगा इनाम देंगे।” जमादार सोचने लगा कि क्या मांगे। उसकी कुछ भी समझ में नहीं आया तो वह बोला : “अन्नदाता! मुझे कल तक की मोहलत दें।”

महाराज ने उसकी बात मान ली। उसी दिन मंत्री के दिमाग में एक खुराफात आई। उसने तुरन्त सेनापति को बुलाकर कहा : “किसी भी तरह उस जमादार को फुसला-उसे कुछ धन देकर कहो कि कल वह सम्राट से तेनालीराम की पीठ पर बैठकर बाजार की सैर करने की इच्छा जाहिर करे।

महाराज ने चूंकि मुंह मांगा इनाम देने की घोषणा की है, इसलिए इकार नहीं कर सकेंगे और इस प्रकार तेनालीराम का जुलूस निकलेगा।” “वाह-वाह, क्या बात कही है।” सेनापति प्रसन्न हो उठा। उसने अपने कक्ष में जाकर तुरन्त जमादार को बुलाया।

“तुम कल महाराज से क्या मांगोगे ?” “समझ में नहीं आ रहा सेनापति जी कि क्या मांगू।” सेनापति ने तुरन्त स्वर्ण मुद्राओं से भरी एक थैली उसकी ओर बढ़ा दी : “ये लो, इसमें हजार स्वर्ण मुद्राएं हैं-तुम्हें महाराज से वही मांगना है जो हम कहें।” “क…क्या ?”

सेनापति ने उसे अपनी बात बताई। सुनकर जमादार डर गया। “अगर हमारी बात नहीं मानोगे तो एक बात याद रखना कि जान से हाथ धो बैठोगे।” भयभीत होकर जमादार ने हामी भर दी। दूसरे दिन महाराज ने उसे बुलाकर पूछा : “बोलो, क्या मांगते हो ?” “महाराज!” हाथ जोड़कर वह डरते-डरते बोला: “मैं…मैं तेनालीराम जी की पीठ पर बैठकर बाजार घूमना चाहता हूं।”

“क्या बकते हो?” महाराज दहाड़े: “तुम होश में तो हो।” “मैं यही चाहता हूं महाराज।” “ठीक है, तुम जाओ और कल दरबार में हाजिर होना।” महाराज क्या करते। वे वचन में बँधे हुए थे। मजबूरी थी, अत: मन मसोसकर उन्होंने तेनालीराम को बुलाया। महाराज ने सारी उलझन उन्हें बताई-फिर पूछा : “हम तो बड़ी उलझन में फंस गए हैं तेनालीराम-तुम्हीं बताओ हम क्या करें।”

“आप बिकुल, भी चिन्ता न करें महाराज!” तेनालीराम ने कहा: “आपने क्या करना है, अब तो जो करना है, मैंने करना है। आप कल दरबार लगने दें-मैं सब ठीक कर दूंगा।” दूसरे दिन दरबार लगा तो जमादार नए वस्त्र पहनकर दरबार में उपस्थित हुआ। वह गुमसुम था।

तेनालीराम उठे और पूरे दरबार को सम्बोधित करके बोले : “बन्धुओ! महाराज की अंगूठी का हीरा टूटने के एवज में जमादार ने मेरी पीठ पर बैठकर बाजार घूमने की इच्छा व्यक्त की है। मैं महाराज के वचन की लाज रखने के लिए इसे अपनी पीठ पर बैठाकर बाजार घुमाने ले जाऊँगा।”

फिर वह जमादार से मुखातिब हुए : “आओ, बैठो मेरी पीठ पर।” सुनते ही जमादार आगे बढ़ा और तेनालीराम के गले में बाहें डालकर उनकी पीठ पर सवार होने लगा। “ठहरो-ये क्या बेहूदगी है।” तेनालीराम ने उसे डपटते हुए कहा: “तुमने मेरी पीठ पर बैठकर सैर करने की बात कही थी-गले में हाथ डालने की नहीं-पीठ पर बैठो-बिना कुछ पकड़े।”

क्षण भर में ही दरबार का माहौल बदल गया। मंत्री और सेनापति के दमकते चेहरे बुझ गए। जमादार अचकचाकर कभी महाराज की ओर देखता, कभी सेनापति की ओर। “सोच क्या रहे हो-पीठ पर बैठते हो या नहीं।” अचानक तेनालीराम ने कड़ककर पूछा।

“बिना सहारे के पीठ पर कैसे बैठा जा सकता है ?” जमादार रुआंसा सा हो उठा। “कैसे बैठा जा सकता है ? ये बात भी उससे पूछो जिसके कहने पर तुमने मेरी पीठ पर बैठकर सैर करने की बात कही थी।” तेनालीराम गुर्राया।

जमादार की नजर फौरन सेनापति की कुर्सी की ओर उठी। मगर वह वहां नहीं था। जमादार फूट-फूटकर रोने लगा, फिर लपककर उसने महाराज के पांव पकड़ लिए: “मुझे क्षमा कर दें महाराज-मुझे जान से मारने की धमकी दी गई थी।” कहते हुए उसने महाराज को पूरी बात बता दी।

महाराज सेनापति की करतूत सुनकर आग-बबूला हो उठे- “मंत्रीजी! हम पांच दिनों के लिए सेनापति को दरबार से मुअत्तल करते हैं। छठे दिन उन्हें दरबार में आकर पहले तेनालीराम से माफी मांगनी होगी, तभी वे अपना आसन ग्रहण कर सकते हैं।” कहकर महाराज सिंहासन से उठ खड़े हुए जिसका अर्थ था कि दरबार की कार्यवाही समाप्त।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #20
दक्षिणा

विजय नगर में एक अपाहिज और गरीब ब्राह्मण रहता था। चूंकि वह पैरों से अपाहिज था, इसलिए उसकी रोजी-रोटी का भी कोई ठिकाना न था। उसने कई बार महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में सहायता की गुहार की, किन्तु राजपुरोहित ने कभी उसकी बात को सिरे नहीं चढ़ने दिया। वह न जाने क्यों उससे जलता था।

एक दिन किसी ने उसे सलाह दी कि तुम तेनालीराम के पास चले जाओ, वे तुम्हारे लिए अवश्य ही कुछ न कुछ करेंगे। तब साहस करके वह एक दिन तेनालीराम के पास जा पहुंचा और उसे पूरी बात बताई। तेनालीराम ने बड़ी गम्भीरता से उसकी बात सुनी। क्षणभर कुछ सोचा, फिर उसके कान में कोई बात कहकर उसे विदा कर दिया।

उस दिन महाराज नर्मदा के दूसरे तट पर महर्षि आश्रम जाने वाले थे क्योंकि गुप्तचर की सूचना के अनुसार वहां कोई सिद्ध संत आने वाले थे। इस यात्रा पर तेनालीराम को भी जाना था। तेनालीराम इस यात्रा के लिए राजमहल जाने की तैयारी कर ही रहे थे कि वह अपाहिज ब्राह्मण आ गया।

उसे विदा करके तेनालीराम घर से निकले तो उन्हें याद आया कि यात्रा के लिए पानी का प्रबंध उन्हें ही करना है, क्योंकि उन दिनों गर्मी का मौसम था और भीषण गर्मी पड़ रही थी। अत: पानी का प्रबंध करते हुए तेनालीराम राजमहल जा पहुंचे। उनके जाते ही काफिला चल पड़ा। आश्रम की दूरी लगभग दस कोस थी।

पांच-छ: कोस चलने के बाद महाराज ने पड़ाव डालने की आज्ञा दी। आमों के छायादार वृक्षों के नीचे पड़ाव डल गया। सभी ने हाथ-मुंह धोकर भोजन प्रारम्भ किया। अभी भोजन चल ही रहा था कि न जाने कैसे पानी की गोल (बड़ा ढोलनुमा घड़ा) लुढ़क गई और देखते ही देखते पीने का सारा पानी बह गया। अब?

सभी परेशान-सभी के हाथ-मुंह भोजन से सने थे। महाराज ने हुक्म दिया : “फौरन पीने के पानी की तलाश की जाए।” सारे सैनिक और दरबारी पानी की तलाश में इधर-उधर फैल गए। मगर वहां दूर-दूर तक पानी का नामी-निशान भी नहीं था।

तभी एक दरबारी आकर बोला : “महाराज! दक्षिण दिशा में एक कुटिया में ठंडे पानी से भरे छ: घड़े रखे हैं, किन्तु कुटिया खाली है।” “तो क्या हुआ?” प्यास से बेचैन एक मंत्री बोला: “सम्राट के लिए पानी को कौन मना कर सकता है। अधिक होगा तो मूल्य चुका देंगे।”

मंत्री की बात से सभी सहमत हो गए। वे सभी कुटिया पर गए और हाथ-मुंह धोकर पानी पीने ही लगे थे कि कुटिया का मालिक आ गया। पुरोहित ने उसे देखा तो चिढ़ गया। वह वही गरीब ब्राह्मण था जिसकी सहायता-याचना पर राजपुरोहित अड़ंगे लगाता था।

वहां आकर वह हाथ जोड़कर राजदरबारियों को पानी पीते देखता रहा। जब सब पानी पी चुके तो मंत्री ने उस गरीब ब्राह्मण से कहा : “हमें प्यास लगी थी, आसपास कहीं पानी न मिला तो तुम्हारा पानी पी लिया। इसका जो मूल्य चाहो ले लो। बोलो, क्या मूल्य लोगे ?”

गरीब ब्राह्मण कुछ बोलता, उससे पहले ही राजपुरोहित बोल पड़ा : “इससे क्या पूछना, दो-चार टके दे दें।” गरीब ब्राह्मण हाथ जोड़कर बड़ी नम्रता से महाराज कृष्णदेव राय से बोला : “नहीं महाराज! मैं पानी का मूल्य नहीं चाहता। हां, पानी को प्रसाद समझकर आप इस गरीब ब्राह्मण को कुछ दक्षिणा देना चाहें तो आशीर्वाद देकर स्वीकार कर लूंगा।”

महाराज ने मुस्कराकर तेनालीराम की ओर देखा, तब तेनालीराम ने कहा : “यह गरीब ब्राह्मण ठीक ही कहता है महाराज। इस संकट की घड़ी में पानी का मिलना भगवान का प्रसाद मिलने के समान ही है। अत: प्रसाद की दक्षिणा भी राजकुल के अनुरूप ही होनी चाहिए।”

महाराज ने तुरन्त अपने गले से मणिमाला उतारकर गरीब ब्राह्मण को दे दी। पुरोहित कसमसाकर रह गया। मंद मुस्कान होंठों पर बिखेरे तेनालीराम राजपुरोहित को कुढ़ते देखकर आनन्दित हो रहे थे।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #21
भैरव-छी

एक बार किसी मुस्लिम रियासत का सुक्का नामक एक पहलवान विजय नगर में आ घुसा। वह सुबह-शाम नगर के मुख्य चौराहों पर लंगोट घुमाता और जब भीड़ इकट्‌ठी हो जाती तो ललकार कर कहता : “है कोई विजय नगर में ऐसा जो सुक्का पहलवान से दो-दो हाथ करे-जीते तो सुक्का से गुलामी कराए, हारे तो सुक्का का गुलाम बने-है कोई ?”

सुक्का पहलवान, पहलवान क्या हाथी था। उसका भयंकर डील-डील और मजबूत पुरजे देखकर विजय नगर के किसी पहलवान की इतनी हिम्मत नहीं हुई कि उसकी चुनौती स्वीकार करे। जब कई दिन गुजर गए तो बात महाराज कृष्णदेव राय के कानों तक पहुंची। वे कुछ विचलित हो उठे।

उन्होंने तुरन्त सेनापति को बुलाकर पूछा : “क्या हमारे राज्य में ऐसा कोई पहलवान नहीं जो सुनका पहलवान का गरूर तोड़ सके ? राज्य की व्यायामशालाओं पर जो लाखों रुपया प्रति वर्ष खर्च होता है, वह व्यर्थ है क्या ?” सेनापति सिर झुकाए खड़ा रहा।

वह बोलता भी क्या, वह तो स्वयं सुक्का पहलवान की शक्ति देख चुका था। वह पक्की ईंटों को दोनों हाथों से गाजर-मूली की तरह तोड़ देता था। पत्थर को नीबू की तरह मुट्ठी में मसल देता था। मजबूत से मजबूत दीवार में भी कंधे की ठोकर मार दे तो उसे धराशायी कर दे। ऐसा बली था।

सेनापति को खामोश देखकर वे बोले : “ये राज्य की प्रतिष्ठा का प्रश्न है। तुरन्त राजदरबारियों को मंत्रणा के लिए बुलाया जाए।” राजदरबारियों की आपात बैठक हुई, मगर कोई ठोस परिणाम न निकल सका। राज्य में कोई ऐसा पहलवान नहीं था जो सुनका को हरा देता।

“फिर क्या करें?” महाराज ने सभी दरबारियों के समक्ष निराशापूर्ण स्वर में कहा: “क्या हार मान लें। उसे दरबार में बुलाकर उपहार आदि देकर सम्मानपूर्वक विदा करें कि तुम जैसा कोई पहलवान हमारे राज्य में नहीं।” सारे दरबारी चुप।

बल्कि महाराज की बात सुनकर अपना सिर और झुका लिया, मानो उनके निर्णय पर अपनी मौन स्वीकृति दै रहे हों। लेकिन तभी तेनालीराम बोला : “नहीं महाराज! ऐसा नहीं होगा।” आशापूर्ण नजरों से महाराज ने तेनालीराम की ओर देखा। “कौन लड़ेगा उससे…?”

“मैं लडुंगा।” सीना ठोककर तेनालीराम ने कहा। “रहने दो तेनालीराम।” व्यंग्य से मुस्कराकर राजपुरोहित ने कहा: “वह तुम्हारी चटनी बना देगा।” “हां तेनालीराम! यह मजाक की बात नहीं है।” महाराज ने कहा : “कहां सुनका पहलवान जैसा हाथी और कहां तुम-दुबले-पतले। कोई और उपाय सोचो ताकि इज्जत बच जाए।”

“और कोई उपाय नहीं है।” तेनालीराम ने कहा: “कम से कम लोग ये तो नहीं कहेंगे कि विजय नगर में सुक्का की ललकार सुनकर कोई सामने नहीं आया। आप ऐलान करवा दें महाराज: आज से एक सप्ताह बाद मैं उससे जोर आजमाऊंगा।” महाराज सोच में पड़ गए। फिर विवश होकर उन्हें स्वीकृति देनी ही पड़ी।

मंत्री, सेनापति और पुरोहित मन ही मन बहुत खुश हुए कि चलो, तेनालीराम ने अपनी मौत को स्वयं ही दावत दे ली। अब इसका किस्सा तो खत्म ही समझो। और-अगले ही दिन विजय नगर में यह समाचार फैल गया कि तेनालीराम ने सुक्का पहलवान की चुनौती कुबूल कर ली है।

सुनने वाले चकित रह गए। तेनालीराम के हितैषियों में तो घबराहट फैल गई। कुछ लोगों को तो सम्राट पर क्रोध भी आया कि इस बेमेल जोड़ी को उन्होंने अपनी स्वीकृति कैसे दे दी। कुछ लोग तेनालीराम को समझाने उसके घर भी गए।

मगर वह घर पर मिला ही नहीं। पांचवें दिन विजय नगर में एक अफवाह और फैली कि तेनालीराम कृष्णा नदी के किनारे बने भैरव मंदिर में भैरव की साधना कर रहा है। यह अफवाह सुक्का ने भी सुनी तो वह कुछ डर खा गया। उसने सुन रखा था कि भैरव अथाह शक्ति वाले देवता हैं और जिस पर मेहरबान हो जाएं उसके दुश्मनों को रसातल में मिला देते हैं।

बस, यह बात मन में आते ही उसे ढेरों आशंकाओं ने घेर लिया। उसके मन में आया कि जाकर देखा जाए कि तेनालीराम कैसी साधना कर रहा है। वह उसी रात लुकता-छिपता मंदिर जा पहुंचा। वहां जाकर उसने जो नजारा देखा, उस्ने देखकर उसके पसीने छूट गए।

उसने देखा कि साक्षात् भैरव तेनालीराम को गोद में बैठाकर अपने हाथों से कुछ जड़ी-बूटी खिलाते हुए कह रहे थे : “ले बेटा, खा, ये भैरव बूटी है। इसे खाने से तू ऐसी शक्ति का स्वामी बन जाएगा कि पहाड़ भी तेरे स्पर्श से थर्राने लगेगा-यदि तू किसी को ठोकर मार देगा तो सैकड़ों योजन दूर जाकर गिरेगा।”

ये देखकर सुक्का पहलवान उल्टे पांव वहां से दौड़ लिया। वह अपने ठिकाने पर आया, अपना बोरिया-बिस्तर लपेटा और उसी क्षण विजय नगर से कूच कर गया। सातवें दिन जब सैनिक सुक्का पहलवान को बुलाने उसके ठिकाने पर गए तो पता चला कि वह तो दो दिन पहले ही विजय नगर से रफूचक्कर हो गया है।

महाराज ने हैरत से तेनालीराम की ओर देखा तो उसने उन्हें पूरी बात बताई और कहा : “महाराज! यदि अपने से अधिक शक्तिशाली को शिकस्त देनी हो तो ताकत से अधिक अक्ल से काम लेना चाहिए।” महाराज ने भावावेश में तेनालीराम को सीने से लगा लिया और बोले : “हमें तुम्हारी बुद्धि पर गर्व है तेनालीराम-तुम रत्न हो हमारे दरबार के।”
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #22
शिल्पी की अद्‌भुत मांग

जब महाराज कृष्णदेव राय पड़ोसी राज्य उड़ीसा पर विजय प्राप्त करके लौटे तो पूरे विजय नगर में हर्ष की लहर दौड़ गई। महाराज ने पूरे राज्य में विजयोत्सव मनाने का ऐलान कर दिया।

दरबार में रोज ही नए-नए कलाकार आकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करके महाराज से उपहार प्राप्त करते। महाराज के मन में आया कि इम अवसर पर विजय-स्तम्भ की स्थापना करवानी चाहिए। फौरन एक शिल्पी को ये कार्य सौंपा गया।

जब विजय-स्तम्भ बनकर पूरा हुआ तो उसकी शोभा देखते ही बनती थी। शिल्प कला की वह अनूठी ही मिसाल था। जब विजय स्तम्भ बनकर पूरा हो गया तो महाराज ने प्रधान शिल्पी को दरबार में बुलाकर पारिश्रमिक देकर कहा : “इसके अतिरिक्त तुम्हारी कला से प्रसन्न होकर हम तुम्हें और भी कुछ देना चाहते हैं, जो चाहो, सो मांग लो।”

“अन्नदाता!” सिर झुकाकर प्रधान शिल्पी बोला: “आपने मेरी कला की इतनी अधिक प्रशंसा की है कि अब मांगने को कुछ भी शेष नहीं बचा। बस, आपकी कृपा बनी रहे, मेरी यही अभिलाषा है।” “नहीं-नहीं-कुछ तो मांगना ही होगा।” महाराज ने हठ पकड़ ली।

दरबारी शिल्पी को समझाकर बोले : “अरे भई! जब महाराज अपनी खुशी से तुम्हे पुरस्कार देना चाहते हैं, तो इकार क्यों करते हो-जो जी चाहे मांग लो, ऐसे मौके बार-बार नहीं मिलते।” मगर शिल्पकार बड़ा ही स्वाभिमानी था। पारिश्रमिक के अतिरिक्त और कुछ भी लेना उसके स्वभाव के विपरीत था। किन्तु सम्राट भी जिद पर अड़े थे।

आज तेनालीराम उपस्थित नहीं थे, जो मामले का आसानी से निपटारा होता। जब शिल्पकार ने देखा कि महाराज मान ही नहीं रहे हैं तो उसने अपने औजारों का थैला खाली करके महाराज की ओर बढ़ा दिया और बोला : “महाराज! यदि कुछ देना चाहते हैं तो मेरा यह थैला संसार की सबसे बहुमूल्य वस्तुसे भरदे।”

महाराज ने उसकी बात सुनकर मंत्री और फिर सेनापति की ओर देखा। सेनापति ने राजपुरोहित की ओर देखा। राजपुरोहित कुर्सी पर बैठे, सिर झुकाए अपने हाथ का नाखून कुतर रहे थे। पूरे राजदरबार पर नजरें घुमाने के बाद महाराज एक दीर्घ निःश्वास छोड़कर रह गए।

क्या दें इसे ? कौन सी चीज दुनिया में सबसे अनमोल है ? अचानक उन्होंने पूछा : “क्या तुम्हारे थैले को हीरे-जवाहरातों से भर दिया जाए ?” “हीरे-जवाहरातों से बहुमूल्य भी कोई वस्तु हो सकती है महाराज !” अब तो महाराज को क्रोध सा आने लगा। मगर वे क्रोध करते कैसे। उन्होंने स्वयं ही तो शिल्पकार से जिद की थी।

अचानक महाराज को तेनालीराम की याद आई। उन्होंने तुरन्त एक सेवक को तेनालीराम को बुलाने भेजा। कुछ देर बाद ही तेनालीराम दरबार में हाजिर था। रास्ते में उसने सेवक से सारी बात मालूम कर ली थी कि क्या बात है और महाराज ने क्यों बुलाया है।

तेनालीराम के आते ही महाराज ने पूछा : “तेनालीराम! संसार में सबसे बहुमूल्य वस्तु कौन सी है ?” “यह लेने वाले पर निर्भर करता है महाराज!” कहकर तेनालीराम ने चारों ओर दृष्टि दौड़ाकर पूछा: “यहां किसे चाहिए संसार की सबसे बहुमूल्य वस्तु?”

“मुझे।” शिल्पकार ने अपना झोला उठाकर कहा: “मुझे चाहिए संसार की सबसे बहुमूल्य वस्तु।” “मिल जाएगी-झोला मेरे पास लाओ।” शिल्पकार तेनालीराम की ओर बढ़ने लगा। हाल में गहरा सन्नाटा छा गया। सबकी सांसें जैसे रुक सी गई थीं। वे जानना और देखना चाहते थे कि संसार की सबसे बहुमूल्य वस्तु क्या है।

तेनालीराम ने शिल्पी के हाथ से झोला लेकर उसका मुंह खोला और तीन-चार बार तेजी से ऊपर नीचे किया। फिर उसका मुंह बांधकर शिल्पकार को देकर बोला : “लो, मैंने इसमें संसार की सबसे बहुमूल्य वस्तु भर दी है।” शिल्पकार प्रसन्न हो उठा। उसने झोला उठाकर महाराज को प्रणाम किया और दरबार से चला गया।

महाराज सहित सभी दरबारी हक्के-बक्के से थे कि तेनालीराम ने उसे ऐसी क्या चीज दी है जो वह इस कदर खुश होकर गया है। उसके जाते ही महाराज ने पूछा : “तुमने झोले में तो कोई वस्तु भरी ही नहीं थी, फिर शिल्पकार चला कैसे गया ?”

“कृपानिधान!” तेनालीराम हाथ जोड़कर बोला: “आपने देखा नहीं, मैंने उसके झोले में हवा भरी थी। हवा संसार की सबसे बहुमूल्य वस्तु है। उसके बिना संसार में कुछ संभव नहीं। उसके बिना प्राणी जीवित नहीं रह सकता-न आग जले, न पानी बने।

किसी कलाकार के लिए तो हवा का महत्त्व और भी अधिक है। कलाकार की कला को हवा न दी जाए तो कला और कलाकार दोनों ही दम तोड़ दें।” “वाह !” महाराज ने तेनालीराम की पीठ थपथपाई और अपने गले की बहुमूल्य माला उतार कर तेनालीराम के गले में डाल दी।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #23
राजा की चिंता – बुढा राजदरबारी ने राज्य छोड़ा

एक बार की बार है दरबार में राजा कृष्णदेव राय और मंत्रीगण बैठे हुए थे। तभी एक बूढ़े राज दरबारी देव परियां ने राजा से कहा की अब वह बहुत बुध हो चूका है और वह अब अपने गाँव जाकर अपना आखरी समय अपने परिवार के साथ बिताना चाहता हूँ। राजा ने उस बूढ़े दरबारी को मना करते हुए कहा कि – आप रुक जाईये हमें आपकी सलाह की बहुत आवश्यकता है।

परन्तु वह दरबारी अत्यंत कमज़ोर और बुढा हो चूका था इसलिए राजा कृष्ण देव राय उसे मना ना कर सके और दरबार के कार्यों से मुक्त कर दिया और उसे सम्मान के साथ उन्हें भेजा।

उस दरबारी के जाने के बाद राजा को बहुत दुख हुआ क्योंकि राजा उनका बहुत आदर करते थे और वह उनके मुख्य सलाहकारों में से एक थे। राजा बहुत दुखी हुए और उन्होंने अपने राज्य के कार्यों पर भी ध्यान देना छोड़ दिया।

तेनालीराम उनके राजा के इस बदलाव को समझ गए और उन्होंने इसका हल निकालने का एक तरकीब सोचा। अगले दिन से तेनाली दरबार में नहीं गए। ऐसा करते करते एक हफ्ता हो गया तेनाली फिर भी दरबार नहीं आये। जब राजा ने अपने सैनिक को तेनाली के घर भेजा तो वहां भी ताला लगा हुआ था।

सैनिक जब दरबार लौटे तो उन्होंने राजा को बताया की उनके घर में तो ताला लगा है और लगता है तेनालीराम हमारा राज्य छोड़ कर चले गए। तभी दरबार में बैठे एक सलाहकार ने राजा से कहा – हे महाराज आप मन को शांत करने के लिए क्यों ना राज्य का दौरा कर आयें? यह बात राजा को पसंद आई और राजा राज्य का सैर करने निकले।

राज्य का सैर करते-करते राजा नदी किनारे पहुंचे वहां वो नदी के सुन्दर नीले रंग के पानी को देखकर मुग्ध हो गए और राजा ने देखा की वहां एक साधू बैठा हुआ है। घूमने के बाद राजा अपने महल में लौट आते हैं।

अगले दिन राजा फिर से नदी किनारे जाते हैं वहां वो दोबारा नदी के पानी को देख कर उसकी सुन्दरता का वर्णन करने लगते हैं। तभी वह साधू राजा की बात सुन कर हसने लगता है।

राजा को समझ नहीं आता की साधू क्यों हंस रहा है और वह साधू से हंसने का कारण पूछते हैं। तब वह साधू राजा को बताते हैं कि कल जो पानी आपने देखा था वह अब बह चूका है और नया पानी बह कर आ चूका है।

इसी प्रकार हमारे जीवन में लोगों का आना और जाना भी लगा रहता है इसलिए उनके जाने से हमें नहीं रूकना चाहिए। आप अपने बूढ़े दरबारी के जाने पर इतने दुखित क्यों हैं?

राजा ने उत्तर दिया – परन्तु तेनालीराम जो जवान है और जिसे मैं बहुत पसंद करता हूँ वो मुझे क्यों छोड़ कर चले गए। क्या आप अपनी शक्ति से बता सकते हैं अभी तेनाली कहाँ हैं?

साधू ने उत्तर दिया – मैं जरूर इसी वक्त आपके सामने तेनालीराम को ला सकता हूँ पर उसके लिए आपको एक वचन देना होगा कि आप इस राज्य को बिना किसी चिंता के चलायें और खुश रहें। ऐसा कह कर उस साधू ने अपना असली रूप दिखाया। वह तेनालीराम था जिसने साधू का रूप धारण किया था।

राजा कृष्णदेव राय बहुत खुश हुए और उन्होंने तेनाली को गले से लगा लिया।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #24
इमानदार तेनालीराम की कहानी

तेनाली रामन अपने दिमाग के बल पर बार-बार अपने राज्य के लोगों की मदद करते थे। दरबार के ज्यादातर लोग तेनालीराम के शौहरत से जलते थे और हमेशा राजा को तेनाली के खिलाफ भड़काते रहते थे। वैसे तो राजा तेनाली पर पूरा विश्वास करते थे पर बहुत दिन तक बार-बार तेनाली के खिलाफ भड़काने के कारण राजा को भी कुछ शक सा हो गया।

अगले दिन जब सुबह दरबार का कार्य शुरू हुआ तो राजा ने तेनालीराम से कहा – तेनालीराम मैं तुम्हरी बहुत शिकायत सुन रहा हूँ कि तुम राज्य के लोगों को ठग रहे हो और उनसे पैसे लूट रहे हो।

तेनालीराम ने राजा को उत्तर देते हुए पुछा – क्या आपको उनके इस बात पर विश्वास है। राजा ने उत्तर दिया – हाँ, अगर तुम बेगुनाह हो तो साबित करो। तेनाली को यह सुन कर बहुत दुख हुआ और वह बिना कुछ कहे ही वहां से निकल गया।

अगले दिन एक सैनिक राजा के लिए एक पत्र लेकर आया। वह पत्र तेनाली का था जिसमें लिखा हुआ था – प्रणाम महाराज, मैंने कई वर्षों तक इमानदारी से आपके राज्य में काम किया है पर आज मुझ पर झूठा आरोप लगाया गया है और मेरी बेगुनाही साबित करने का एक ही रास्ता था मैं अपनी जान ले लूं।

राजा यह जान कर चिंतित हो गए और चिल्लाने लगे वापस आ जाओ तेनाली यह साबित करने का सही तरिका नहीं है। तभी दरबार में बैठे एक के बाद एक मंत्री और लोग तेनाली की तारीफ करने लगे और उसके कार्यों का गुण गाने लगे। तेनाली वहीँ भेस बदलकर चुप कर सब कुछ देख रहा था। तभी तेनाली अपने असली भेस में आगे आये।

तेनाली को देख कर राजा खुश हुए। तब तेनाली ने राजा से कहा – हे महाराज इस दरबार में बैठे सभी लोगों ने मेरे विषय में अच्छा ही कहा, क्या इससे कोई अच्छा रास्ता है यह बताने के लिए कि मैं इमानदार हूँ। राजा ने तेनाली से क्षमा माँगा और अपना गलती माना।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #25
महामूर्ख की उपाधि

विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय होली का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाते थे। इस अवसर पर हास्य-मनोरंजन के कई कार्यक्रम होते थे। हर कार्यक्रम के सफल कलाकार को पुरस्कार भी दिया जाता था। सबसे बड़ा पुरस्कार ‘महामूर्ख’ की उपाधि पाने वाले को दिया जाता था। कृष्णदेव राय के दरबार में तेनालीराम सबका मनोरंजन करते थे। वे बहुत तेज दिमाग के थे। उन्हें हर साल का सर्वश्रेष्ठ हास्य-कलाकर का पुरस्कार तो मिलता ही था, ‘महामूर्ख’ का खिताब भी हर साल वही जीत ले जाते। दरबारी इस कारण से उनसे जलते थे। उन्होंने एक बार मिलकर तेनालीराम को हराने की युक्ति निकाली। इस बार होली के दिन उन्होंने तेनालीराम को खूब छककर भांग पिलवा दी। होली के दिन तेनालीराम भांग के नशे में देर तक सोते रहे। उनकी नींद खुली तो उन्होंने देखा दोपहर हो रही थी। वे भागते हुए दरबार पहुंचे। आधे कार्यक्रम खत्म हो चुके थे। कृष्णदेव राय उन्हें देखते ही डपटकर पूछ बैठे, ‘अरे मूर्ख तेनालीरामजी, आज के दिन भी भांग पीकर सो गए?’ राजा ने तेनालीराम को ‘मूर्ख’ कहा, यह सुनकर सारे दरबारी खुश हो गए। उन्होंने भी राजा की हां में हां मिलाई और कहा, ‘आपने बिलकुल ठीक कहा, तेनालीराम मूर्ख ही नहीं महामूर्ख हैं।’ जब तेनालीराम ने सबके मुंह से यह बात सुनी तो वे मुस्कराते हुए राजा से बोले, ‘धन्यवाद महाराज, आपने अपने मुंह से मुझे महामूर्ख घोषित कर आज के दिन का सबसे बड़ा पुरस्कार दे दिया।’ तेनालीराम की यह बात सुनकर दरबारियों को अपनी भूल का पता चल गया, पर अब वे कर भी क्या सकते थे? क्योंकि वे खुद ही अपने मुंह से तेनालीराम को महामूर्ख ठहरा चुके थे। हर साल की तरह इस साल भी तेनालीराम ‘महामूर्ख’ का पुरस्कार जीत ले गए।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #26
महामूर्ख की उपाधि

विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय होली का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाते थे। इस अवसर पर हास्य-मनोरंजन के कई कार्यक्रम होते थे। हर कार्यक्रम के सफल कलाकार को पुरस्कार भी दिया जाता था। सबसे बड़ा पुरस्कार ‘महामूर्ख’ की उपाधि पाने वाले को दिया जाता था। कृष्णदेव राय के दरबार में तेनालीराम सबका मनोरंजन करते थे। वे बहुत तेज दिमाग के थे। उन्हें हर साल का सर्वश्रेष्ठ हास्य-कलाकर का पुरस्कार तो मिलता ही था, ‘महामूर्ख’ का खिताब भी हर साल वही जीत ले जाते। दरबारी इस कारण से उनसे जलते थे। उन्होंने एक बार मिलकर तेनालीराम को हराने की युक्ति निकाली। इस बार होली के दिन उन्होंने तेनालीराम को खूब छककर भांग पिलवा दी। होली के दिन तेनालीराम भांग के नशे में देर तक सोते रहे। उनकी नींद खुली तो उन्होंने देखा दोपहर हो रही थी। वे भागते हुए दरबार पहुंचे। आधे कार्यक्रम खत्म हो चुके थे। कृष्णदेव राय उन्हें देखते ही डपटकर पूछ बैठे, ‘अरे मूर्ख तेनालीरामजी, आज के दिन भी भांग पीकर सो गए?’ राजा ने तेनालीराम को ‘मूर्ख’ कहा, यह सुनकर सारे दरबारी खुश हो गए। उन्होंने भी राजा की हां में हां मिलाई और कहा, ‘आपने बिलकुल ठीक कहा, तेनालीराम मूर्ख ही नहीं महामूर्ख हैं।’ जब तेनालीराम ने सबके मुंह से यह बात सुनी तो वे मुस्कराते हुए राजा से बोले, ‘धन्यवाद महाराज, आपने अपने मुंह से मुझे महामूर्ख घोषित कर आज के दिन का सबसे बड़ा पुरस्कार दे दिया।’ तेनालीराम की यह बात सुनकर दरबारियों को अपनी भूल का पता चल गया, पर अब वे कर भी क्या सकते थे? क्योंकि वे खुद ही अपने मुंह से तेनालीराम को महामूर्ख ठहरा चुके थे। हर साल की तरह इस साल भी तेनालीराम ‘महामूर्ख’ का पुरस्कार जीत ले गए।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #26
जादुई कुएं

एक बार राजा कृष्णदेव राय ने अपने गृहमंत्री को राज्य में अनेक कुएं बनाने का आदेश दिया। गर्मियां पास आ रही थीं इसलिए राजा चाहते थे कि कुएं शीघ्र तैयार हो जाएं ताकि लोगों को गर्मियों में थोड़ी राहत मिल सके।गृहमंत्री ने इस कार्य के लिए शाही कोष से बहुत-सा धन लिया। शीघ्र ही राजा के आदेशानुसार नगर में अनेक कुएं तैयार हो गए। इसके बाद एक दिन राजा ने नगर भ्रमण किया और कुछ कुओं का स्वयं निरीक्षण किया। अपने आदेश को पूरा होते देख वे संतुष्ट हो गए।गर्मियों में एक दिन नगर के बाहर से कुछ गांव वाले तेनालीराम के पास पहुंचे, वे सभी गृहमंत्री के विरुद्ध शिकायत लेकर आए थे। 

तेनालीराम ने उनकी शिकायत सुनी और उन्हें न्याय प्राप्त करने का रास्ता बताया।तेनालीराम अगले दिन राजा से मिले और बोले, ‘महाराज! मुझे विजयनगर में कुछ चोरों के होने की सूचना मिली है। वे हमारे कुएं चुरा रहे हैं।’इस पर राजा बोले, ‘क्या बात करते हो, तेनाली! कोई चोर कुएं को कैसे चुरा सकता है?’महाराज! यह बात आश्चर्यजनक जरूर है, परंतु सच है। वे चोर अब तक कई कुएं चुरा चुके हैं।’ तेनालीराम ने बहुत ही भोलेपन से कहा।उसकी बात को सुनकर दरबार में उपस्थित सभी दरबारी हंसने लगे।महाराज ने कहा, ‘तेनालीराम, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है। आज कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हो? तुम्हारी बातों पर कोई भी व्यक्ति विश्वास नहीं कर सकता।’महाराज! मैं जानता था कि आप मेरी बात पर विश्वास नहीं करंगे इसलिए मैं कुछ गांव वालों को साथ साथ लाया हूं। 

वे सभी बाहर खड़े हैं। यदि आपको मुझ पर विश्वास नहीं है तो आप उन्हें दरबार में बुलाकर पूछ लीजिए। वे आपको सारी बात विस्तारपूर्वक बता दंगे।’राजा ने बाहर खड़े गांव वालों को दरबार में बुलवाया। एक गांव वाला बोला, ‘महाराज! गृहमंत्री द्वारा बनाए गए सभी कुएं समाप्त हो गए हैं, आप स्वयं देख सकते हैं।’राजा ने उनकी बात मान ली और गृहमंत्री, तेनालीराम, कुछ दरबारियों तथा गांव वालों के साथ कुओं का निरीक्षण करने के लिए चल दिए। पूरे नगर का निरीक्षण करने के पश्चात उन्होंने पाया कि राजधानी के आस-पास के अन्य स्थानो तथा गांवों में कोई कुआं नहीं है।

राजा को यह पता लगते देख गृहमंत्री घबरा गया। वास्तव में उसने कुछ कुओं को ही बनाने का आदेश दिया था। बचा हुआ धन उसने अपनी सुख-सुविधाओं पर व्यय कर दिया।अब तक राजा भी तेनालीराम की बात का अर्थ समझ चुके थे। वे गृहमंत्री पर क्रोधित होने लगे, तभी तेनालीराम बीच में बोल पड़ा, ‘महाराज! इसमें इनका कोई दोष नहीं है। वास्तव में वे जादुई कुएं थे, जो बनने के कुछ दिन बाद ही हवा में समाप्त हो गए।’अपनी बात समाप्त कर तेनालीराम गृहमंत्री की ओर देखने लगा। गृहमंत्री ने अपना सिर शर्म से झुका लिया।राजा ने गृहमंत्री को बहुत डांटा तथा उसे सौ और कुएं बनवाने का आदेश दिया। इस कार्य की सारी जिम्मेदारी तेनालीराम को सौंपी गई।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #27
रंग-बिरंगे नाखून

सभी जानते हैं कि राजा कृष्णदेव राय पशु-पक्षियों से बहुत प्यार करते थे। एक दिन एक बहेलिया राजदरबार में आया। उसके पास पिंजरे में एक सुंदर व रंगीन विचित्र किस्म का पक्षी था।वह राजा से बोला, ‘महाराज, इस सुंदर व विचित्र पक्षी को मैंने कल जंगल से पकड़ा है। यह बहुत मीठा गाता है तथा तोते के समान बोल भी सकता है। यह मोर के समान रंग-बिरंगा ही नहीं है बल्कि उसके समान नाच कर भी दिखा सकता हैं। मैं यहां यह पक्षी आपको बेचने के लिए आया हूं।’राजा ने पक्षी को देखा और बोले, ‘हां, देखने में यह पक्षी बहुत रंग-बिरंगा और विचित्र है।

 तुम्हें इसके लिए उपयुक्त मूल्य दिया जाएगा।’राजा ने बहेलिए को 50 स्वर्ण मुद्राएं दीं और उस पक्षी को अपने महल के बगीचे में रखवाने का आदेश दिया। तभी तेनालीराम अपने स्थान से उठा और बोला, ‘महाराज, मुझे नहीं लगता कि यह पक्षी बरसात में मोर के समान नृत्य कर सकता है बल्कि मुझे तो लगता है कि यह पक्षी कई वर्षों से नहाया भी नहीं हैं।’तेनालीराम की बात सुनकर बहेलिया डर गया और दुखी स्वर में राजा से बोला, ‘महाराज, मैं एक निर्धन बहेलिया हूं। पक्षियों को पकड़ना और बेचना ही मेरी आजीविका है। अतः मैं समझता हूं कि पक्षियों के बारे में मेरी जानकारी पर बिना किसी प्रमाण के आरोप लगाना अनुचित है। यदि मैं निर्धन हूं तो क्या तेनालीजी को मुझे झूठा कहने का अधिकार मिल गया है।’बहेलिए की यह बात सुन महाराज भी तेनालीराम से अप्रसन्न होते हुए बोले, ‘तेनालीराम, तुम्हें ऐसा कहना शोभा नहीं देता। 

क्या तुम अपनी बात सिद्ध कर सकते हो?’मैं अपनी बात सिद्ध करना चाहता हूं, महाराज।’ यह कहते हुए तेनालीराम ने एक गिलास पानी पक्षी के पिंजरे में गिरा दिया। पक्षी गीला हो गया और सभी दरबारी पक्षी को आश्चर्य से देखने लगे।पक्षी पर गिरा पानी रंगीन हो गया और उसका रंग हल्का भूरा हो गया। राजा तेनालीराम को आश्चर्य से देखने लगे।तेनालीराम बोला, ‘महाराज यह कोई विचित्र पक्षी नहीं है बल्कि जंगली कबूतर है।’परंतु तेनालीराम तुम्हें कैसे पता लगा कि यह पक्षी रंगा गया है?’महाराज, बहेलिए के रंगीन नाखूनों से।

 पक्षी पर लगे रंग तथा उसके नाखूनों का रंग एक समान है।’अपनी पोल खुलते देख बहेलिया भागने का प्रयास करने लगा, परंतु सैनिकों ने उसे पकड़ लिया।राजा ने उसे धोखा देने के अपराध में जेल में डाल दिया और उसे दिया गया पुरस्कार अर्थात 50 स्वर्ण मुद्राएं तेनालीराम को दे दिया गया।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #28
मौत की सजा

बीजापुर के सुल्तान इस्माइल आदिलशाह को डर था कि राजा कृष्णदेव राय अपने प्रदेश रायचूर और मदकल को वापस लेने के लिए हम पर हमला करेंगे। उसने सुन रखा था कि वैसे राजा ने अपनी वीरता से कोडीवडु, कोंडपल्ली, उदयगिरि, श्रीरंगपत्तिनम, उमत्तूर और शिवसमुद्रम को जीत लिया था।सुलतान ने सोचा कि इन दो नगरों को बचाने का एक ही उपाय है कि राजा कृष्णदेव राय की हत्या करवा दी जाए। उसने बड़े इनाम का लालच देकर तेनालीराम के पुराने सहपाठी और उसके मामा के संबंधी कनकराजू को इस काम के लिए राजी कर लिया।

कनकराजू तेनालीराम के घर पहुंचा। तेनालीराम ने अपने मित्र का खुले दिल से स्वागत किया। उसकी खूब आवभगत की और अपने घर में उसे ठहराया।एक दिन जब तेनालीराम काम से कहीं बाहर गया हुआ था, कनकराजू ने राजा को तेनालीराम की तरफ से संदेश भेजा- ‘आप इसी समय मेरे घर आएं तो आपको ऐसी अनोखी बात दिखाऊं, जो आपने जीवनभर न देखी हो।’राजा बिना किसी हथियार के तेनालीराम के घर पहुंचे। अचानक कनकराजू ने छुरे से उन पर वार कर दिया। 

इससे पहले कि छुरे का वार राजा को लगता, उन्होंने कसकर उसकी कलाई पकड़ ली। उसी समय राजा के अंगरक्षकों के सरदार ने कनकराजू को पकड़ लिया और वहीं उसे ढेर कर दिया।कानून के अनुसार, राजा को मारने की कोशिश करने वाले को जो व्यक्ति आश्रय देता था, उसे मृत्युदंड दिया जाता था। तेनालीराम को भी मृत्युदंड सुनाया गया।

 उसने राजा से दया की प्रार्थना की।राजा ने कहा, ‘मैं राज्य के नियम के विरुद्ध जाकर तुम्हें क्षमा नहीं कर सकता। तुमने उस दुष्ट को अपने यहां आश्रय दिया। तुम कैसे मुझसे क्षमा की आशा कर सकते हो? हां, यह हो सकता है कि तुम स्वयं फैसला कर लो, तुम्हें किस प्रकार की मृत्यु चाहिए?’‘मुझे बुढ़ापे की मृत्यु चाहिए, महाराज।’ तेनालीराम ने कहा।सभी आश्चर्यचकित थे। राजा हंसकर बोले, ‘इस बार भी बच निकले तेनालीराम।’
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #29
रंग-बिरंगी मिठाइयां

वसंत ऋतु छाई हुई थी। राजा कृष्णदेव राय बहुत ही प्रसन्न थे। वे तेनालीराम के साथ बाग में टहल रहे थे।वे चाह रहे थे कि एक ऐसा उत्सव मनाया जाए जिसमें उनके राज्य के सारे लोग सम्मिलित हों। पूरा राज्य उत्सव के आनंद में डूब जाए। इस विषय में वे तेनालीराम से भी राय लेना चाहते थे।तेनालीराम ने राजा की इस सोच की प्रशंसा की और इस प्रकार विजयनगर में राष्ट्रीय उत्सव मनाने का आदेश दिया गया।

 शीघ्र ही नगर को स्वच्छ करवा दिया गया, सड़कों व इमारतों पर रोशनी की गई। पूरे नगर को फूलों से सजाया गया। सारे नगर में उत्सव का वातावरण था।इसके बाद राजा ने घोषणा की कि राष्ट्रीय उत्सव मनाने के लिए मिठाइयों की दुकानों पर रंग-बिरंगी मिठाइयां बेची जाएं। घोषणा के बाद मिठाई की दुकान वाले मिठाइयां बनाने में व्यस्त हो गए।कई दिनों से तेनालीराम दरबार में नहीं आ रहा आ रहा था। राजा ने तेनालीराम को ढूंढने के लिए सिपाहियों को भेजा, परंतु वे भी तेनालीराम को नहीं ढूंढ पाए। 
उन्होंने राजा को इस विषय में सूचित किया।इससे राजा और भी अधिक चिंतित हो गए। उन्होंने तेनालीराम को सतर्कतापूर्वक ढूंढने का आदेश दिया।कुछ दिनों बाद सैनिकों ने तेनालीराम को ढूंढ निकाला। वापस आकर वे राजा से बोले, ‘महाराज, तेनालीराम ने कपड़ों की रंगाई की दुकान खोल ली है तथा वह सारा दिन अपने इसी काम में व्यस्त रहता है। जब हमने उसे अपने साथ आने को कहा तो उसने आने से मना कर दिया।’यह सुनकर राजा क्रोधित हो गए। वे सैनिकों से बोले, ‘मैं तुम्हें आदेश देता हूं कि तेनालीराम को जल्दी से जल्दी पकड़कर यहां ले आओ। यदि वह तुम्हारे साथ न आए तो उसे बलपूर्वक लेकर आओ।’राजा के आदेश का पालन करते हुए सैनिक तेनालीराम को बलपूर्वक पकड़कर दरबार में ले आए।राजा ने पूछा, ‘तेनाली, तुम्हें लाने के लिए जब मैंने सैनिकों को भेजा तो तुमने शाही आदेश का पालन क्यों नहीं किया तथा तुमने यह रंगरेज की दुकान क्यों खोली? हमारे दरबार में तुम्हारा अच्छा स्थान है जिससे तुम अपनी सभी आवश्यकताएं पूरी कर सकते हो।’तेनालीराम बोला, ‘महाराज दरअसल मैं राष्ट्रीय उत्सव के लिए अपने वस्त्रों को रंगना चाहता था। इससे पहले कि सारे रंगों का प्रयोग दूसरे कर लें, मैं रंगाई का कार्य पूर्ण कर लेना चाहता था।’सभी रंगों के प्रयोग से तुम्हारा क्या तात्पर्य है? क्या सभी अपने वस्त्रों को रंग रहे हैं?’ राजा ने पूछा।नहीं महाराज, वास्तव में रंगीन मिठाइयां बनाने के आपके आदेश के पश्चात सभी मिठाई बनाने वाले मिठाइयों को रंगने के लिए रंग खरीदने में व्यस्त हो गए हैं। यदि वे सारे रंगों को मिठाइयों को रंगने के लिए खरीद लेंगे तो मेरे वस्त्र कैसे रंगे जाएंगे?’इस पर राजा को अपनी भूल का अहसास हुआ। वे बोले, ‘तो तुम यह कहना चाहते हो कि मेरा आदेश अनुचित है। मेरे आदेश का लाभ उठाकर मिठाइयां बनाने वाले मिठाइयों को रंगने के लिए घटिया व हानिकारक रंगों का प्रयोग कर रहे हैं। उन्हें केवल खाने योग्य रंगों का ही उपयोग करना चाहिए’, इतना कहकर महाराज ने तेनालीराम को देखा। तेनालीराम के चेहरे पर वही चिर-परिचित मुस्कुराहट थी।राजा कृष्णदेव राय ने गंभीर होते हुए आदेश दिया कि जो मिठाई बनाने वाले हानिकारक रासायनिक रंगों का प्रयोग कर रहे हैं, उन्हें कठोर दंड दिया जाए।इस प्रकार तेनालीराम ने अपनी बुद्धि के प्रयोग से एक बार फिर विजयनगर के लोगों की रक्षा की।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #30
मृत्युदंड की धमकी

थट्टाचारी कृष्णदेव राय के दरबार में राजगुरु थे। वे तेनालीराम से बहुत ईर्ष्या करते थे। उन्हें जब भी मौका मिलता तो वे तेनालीराम के विरुद्ध राजा के कान भरने से नहीं चूकते थे।एक बार क्रोध में आकर राजा ने तेनालीराम को मृत्युदंड देने की घोषणा कर दी, परंतु अपनी विलक्षण बुद्धि और हाजिरजवाबी से तेनालीराम ने जीवन की रक्षा की।एक बार तेनालीराम ने राजा द्वारा दी जाने वाली मृत्युदंड की धमकी को हमेशा के लिए समाप्त करने की योजना बनाई। वे थट्टाचारी के पास गए और बोले, ‘महाशय, एक सुंदर नर्तकी शहर में आई है। वह आपके समान किसी महान व्यक्ति से मिलना चाहती है।उसने आपकी काफी प्रशंसा भी सुन रखी है। आपको आज की रात उसके घर जाकर उससे अवश्य मिलना चाहिए, परंतु आपकी बदनामी न हो इसलिए उसने कहलवाया है कि आप उसके पास एक स्त्री के रूप में जाइएगा।’थट्टाचारी तेनालीराम की बातों से सहमत हो गए।इसके बाद तेनालीराम राजा के पास गए और वही सारी कहानी राजा को सुनाई। राजा की अनेक पत्नियां थीं तथा वे एक और नई पत्नी चाहते थे अतः वे भी स्त्री के रूप में उस नर्तकी से मिलने के लिए तैयार हो गए।शाम होते ही तेनालीराम ने उस भवन की सारी बत्तियां बुझा दीं, जहां उसने राजगुरु और राजा को बुलाया था। स्त्री वेश में थट्टाचारी पहले पहुंचे और अंधेरे कक्ष में जाकर बैठ गए। वहीं प्रतीक्षा करते हुए उन्हें पायल की झंकार सुनाई दी।उन्होंने देखा कि एक स्त्री ने कमरे में प्रवेश किया है, परंतु अंधेरे के कारण वह उसका चेहरा ठीक से नहीं देख पाए। वास्तव में राजगुरु जिसे स्त्री समझ रहे थे वह स्त्री नहीं, बल्कि राजा ही थे और वार्तालाप शुरू होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। थोड़ी देर पश्चात कमरे की खिड़की के पास खड़े तेनालीराम को आवाज सुनाई पड़ी।प्रिय, तुम मुझे अपना सुंदर चेहरा क्यों नहीं दिखा रही हो?’ थट्टाचारी मर्दाना आवाज में बोले।राजा ने राजगुरु की आवाज पहचान ली और बोले, ‘राजगुरु, आप यहां क्या कर रहे हैं?’राजगुरु ने राजा की आवाज पहचान ली। शीघ्र ही वे दोनों समझ गए कि तेनालीराम ने उन्हें मूर्ख बनाया है। दोनों ने कक्ष से बाहर आने का प्रयास किया, परंतु तेनालीराम ने द्वार बाहर से बंद कर उस पर ताला लगा दिया था।वह खिडकी से चिल्लाया, ‘यदि आप दोनों यह वचन दें कि भविष्य में कभी मृत्युदंड देने की धमकी नहीं देंगे तो मैं दरवाजा खोल दूंगा।’महाराज को तेनालीराम के इस दुस्साहस पर बहुत ही क्रोध आया, पर इस परिस्थिति में दोनों अंधकारमय कक्ष में असहाय थे और तेनालीराम की इस हरकत का उसे मजा भी नहीं चखा सकते थे।ऊपर से दोनों को बदनामी का डर अलग था और दोनों के पास अब कोई रास्ता भी नहीं बचा था इसलिए दोनों ने ही तेनालीराम की बात मान ली।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #31
भगवान का संदेश

एक बार महाराज कृष्णदेव राय के मन में एक विशाल शिवालय बनवाने की इच्छा उपजी। उन्होंने मंत्री को बुलाकर आदेश दिया कि शिवालय के लिए कोई उपयुक्त स्थान खोजा जाए।

इसके लिए मंत्री ने नगर के समीपवर्ती जंगल के एक भूखण्ड को चुना। तुरन्त ही उस स्थान की सफाई का कार्य प्रारम्भ हो गया। जब उस स्थान की सफाई की जाने लगी तो वहां किसी पुराने शिवालय के खण्डहर मिले, जिनकी खुदाई करने पर वहां से भगवान शंकर की सोने की एक आदमकद प्रतिमा मिली।

सोने की उस ठोस मूर्ति को देखकर मंत्री के मन में लालच आ गया और उसने उसे उठवाकर चुपचाप अपने घर पहुंचवा दिया। वहां खुदाई करने वाले मजदूरों में तेनालीराम के आदमी भी थे। उन्होंने इस बात की इत्तिला तुरन्त ही तेनालीराम को दे दी। सुनकर तेनालीराम चुप रहा और मौके का इन्तजार करने लगा।

उधर भूमि पूजन के बाद शिवालय का निर्माण कार्य शुरू हो गया। एक दिन दरबार लगा हुआ था, तभी महाराज ने एकाएक दरबारियों से पूछा कि भगवान की कैसी मूर्ति बनवायी जाए ? दरबारी अपनी-अपनी राय देने लगे। महाराज कुछ तय नहीं कर पाए और बात दूसरे दिन के लिए टल गई।

दूसरे दिन जब दरबार लगा तो दरबार में एक जटाजूट धारी संन्यासी ने प्रवेश किया। महाराज ने सिंहासन से उठकर उनका स्वागत कर सम्मान सहित आसन दिया। “राजन !” सिंहासन पर न बैठकर संन्यासी बोले : “मैं आपकी चिन्ता का निवारण करने भगवान शिव के आदेश पर यहां उपस्थित हुआ हूं और आपके लिए उनका संदेश लाया हूं।”

“भगवान शिव का संदेश…।” महाराज रोमांचित से हो उठे: “यथाशीघ्र बताएं ऋषिवर-कक्षा संदेश भेजा है भगवान शिव ने ?” “राजन! मंदिर के लिए भगवान शंकर ने स्वयं अपनी स्वर्ण निर्मित आदमकद प्रतिमा भेज दी है और इस समय वह मंत्रीजी के घर पर रखी है। उसे वहां से उठवाकर मंदिर में प्रतिष्ठित कर दो।”

“बम-बम भोले। ” कहकर साधु चला गया। महाराज ने मंत्री की ओर देखा, मंत्री तो पहले ही हकबकाया सा था कि उस साधु को प्रतिमा की बात कैसे पता चली? मगर अब चूंकि पोल खुल चुकी थी, अत: उसने स्वीकार किया कि प्रतिमा खुदाई में प्राप्त हुई थी।

तभी महाराज को कुछ ध्यान आया और उन्होंने दरबार में चारों तरफ नजर दौड़ाई, तेनालीराम वहां कहीं नहीं था। थोड़ी देर ही गुजरी थी कि तेनालीराम वहां आ गया। उसे देखकर सभी हंस पड़े। एक सभासद बोले : “महाराज! शायद यही थे वे साधु बाबा। कपड़े ओर जटा तो उतार आए मगर कंठीमाला उतारनी भूल गए।” एक बार फिर हंसी का ठहाका गूंजा। “अब मंदिर निर्माण का कार्य तेनालीराम की देख-रेख में होगा।” महाराज ने घोषणा की।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #32
कुएं का विवाह

एक बार महाराज कृष्णदेव राय और तेनालीराम में किसी बात को लेकर कहासुनी हो गई और तेनालीराम रूठकर कहीं चले गए। शुरू-शुरू में तो महाराज ने क्रोध में कोई ध्यान नहीं दिया, मगर जब आठ-दस दिन गुजर गए तो महाराज को बड़ा अजीब सा लगने लगा।

उनका मन उदास हो गया। उन्हें कुछ चिन्ता भी हुई। उन्होंने तुरन्त सेवकों को उनकी खोज में भेजा। उन्होंने आसपास का पूरा क्षेत्र छान मारा, मगर तेनालीराम का कहीं पता न चला। महाराज सोचने लगे कि क्या करें ? अचानक उनके मस्तिष्क में एक युक्ति आई।

उन्होंने आसपास और दूर-दराज के सभी गांवों में मुनादी करा दी कि महाराज अपने राजकीय कुएं का विवाह रचा रहे हैं अत: गांव के सभी मुखिया अपने-अपने गांव के कुओं को लेकर राजधानी पहुंचें, जो भी मुखिया इस आज्ञा का पालन नहीं करेगा, उसे दण्ड स्वरूप बीस हजार स्वर्ण मुद्राएं जुर्माना देनी होंगी।

यह ऐलान सुनकर सभी हैरान रह गए। भला कुएं भी कहीं लाए-ले जाए जा सकते हैं। कैसा पागलपन है। कहीं महाराज के दिमाग में कोई खराबी तो नहीं आ गई। जिस गांव में तेनालीराम भेष बदलकर रह रहा था, वहां भी यह घोषणा सुनाई दी। उस गांव का मुखिया भी काफी परेशान हुआ।

तेनालीराम इस बात को सुनकर समझ गए कि उसे खोजने के लिए ही महाराज ने यह चाल चली है। उसने मुखिया को बुलाकर कहा : “मुखिया जी, आप बिकुल चिन्ता न करें, आपने मुझे अपने गांव में आश्रय दिया है, अत: आपके इस उपकार का बदला मैं अवश्य ही चुकाऊंगा।

मैं आपको एक तरकीब बताता हूं। आप आसपास के गांवों के मुखियाओं को एकत्रित करके राजधानी की ओर प्रस्थान करें।” मुखिया ने आस-पास के गांवों के चार-पांच मुखिया एकत्रित किए और सभी राजधानी की ओर चल दिए। तेनालीराम उनके साथ ही था।

राजधानी के बाहर पहुंचकर वे एक स्थान पर रुक गए। उनमें से एक को तेनालीराम ने मुखिया का संदेश लेकर राजदरबार में भेजा। वह व्यक्ति दरबार में पहुंचा और तेनालीराम के बताए अनुसार बोला : “महाराज! हमारे गांव के कुएं विवाह में शामिल होने के लिए राजधानी के बाहर डेरा डाले हुए हैं। आप कृपा करके राजकीय कुएं को उनकी अगवानी के लिए भेजें।”

महाराज उसकी बात सुनते ही उछल पड़े। उन्हें समझते देर नहीं लगी कि ये तेनालीराम की सूझबूझ है। उन्होंने तुरन्त पूछा : “सच-सच बताओ कि तुम्हें ये युक्ति किसने बताई है ?” “महाराज ! कुछ दिन पहले हमारे गांव में एक परदेशी आकर ठहरा है, उसी ने हमें ये तरकीब बताई है।”

“कहां है वह ?” “मुखिया जी के साथ राजधानी के बाहर ही ठहरा हुआ है।” महाराज स्वयं रथ पर चढ़कर राजधानी से बाहर गए और बड़ी धूमधाम से तेनालीराम को दरबार में वापस लाए। फिर गांव वालों को भी पुरस्कार देकर विदा किया।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #32
लालच नहीं स्वामी भक्ति

एक बार महाराज कृष्णदेव राय ने किसी बात से प्रसन्न होकर तेनालीराम को परातभर स्वर्ण मुद्राएं भेंट कीं और साथ ही यह भी कह दिया कि तेनालीराम स्वयं इन स्वर्ण मुद्राओं से भरी परात को उठाकर दरबार से लेकर जाएंगे।

स्वर्ण मुद्राओं से भरी वह परात काफी भारी थी। दरबारी मन ही मन हंस रहे थे कि आज बेचारे तेनालीराम का जुलूस निकलेगा, क्योंकि स्वर्ण मुद्राओं से भरी परात वह किसी भी सूरत में उठा नहीं पाएगा। तेनालीराम ने कोशिश की, मगर वह उस परात को हिला भी न पाया।

अचानक उसे एक युक्ति सूझी, उसने अपनी पगड़ी खोलकर फर्श पर बिछाई और जितनी स्वर्ण मुद्राएं उसमें आ सकती थीं, भरकर उसकी एक पोटली बना ली। बाकी मुद्राएं उसने अपने कुर्ते की जेबों में भर लीं। फिर पोटली को उसने झोली की भांति पीठ पर लादा और परात उठाकर सिर पर रखी और बाहर की ओर चल दिया।

उसकी सूझ-बूझ देखकर सभी दरबारी चकित रह गए। वे तो सोच रहे थे कि तेनालीराम का मजाक उड़ाएंगे, मगर हुआ उल्टा ही। तभी महाराज ने ताली बजाकर ‘वाह-वाह’ कहते हुए उसकी सूझबूझ की प्रशंसा की, उनका अभिनंदन करने के लिए जैसे ही तेनालीराम घूमा, वैसे ही उसकी जेब थोड़ी सी उधड़ गई और कुछ मुद्राएं बिखर गईं।

तेनालीराम ने गठरी और परात एक ओर रखी तथा बैठकर स्वर्ण मुद्राएं उठाने लगा। “कितना लालची है।” अचानक पुरोहित ने चुटकी ली: “एक परात स्वर्ण मुद्राएं मिली हैं, फिर भी दो-चार के लिए परेशान हो रहा है।” दरबारी भी मजा लेने लगे। कोई कहता : “अरे देखो, एक उधर भी है, उधर कुर्सी के नीचे-उधर देखो, अपनी दाईं तरफ।”

इसी प्रकार उससे जलने वाले दरबारी उसे नचा रहे थे। तभी मंत्री ने महाराज से फुसफुसाकर कहा : “ऐसा लालची आदमी मनैं अपने जीवन में नहीं देखा।” महाराज को भी दो-चार मुद्राओं के लिए तेनालीराम का इस प्रकार नाचना अच्छा न लगा। दरबारियों द्वारा उसका मजाक उड़ाते देख महाराज का मूड उखड़ सा गया और तनिक चिढ़कर वे बोले:

“अब बस भी करो तेनालीराम! इतना लालच भी अच्छा नहीं होता। क्या तुम्हें परातभर मुद्राओं में सन्तोष नहीं हुआ जो दो-चार मुद्राओं के लिए इतने व्याकुल हो रहे हो।” “बात वो नहीं है अन्नदाता जो सब लोग समझ रहे हैं।” तेनालीराम हाथ जोड़कर बोला : “दरअसल इन सभी स्वर्ण मुद्राओं पर आपका चित्र और नाम अंकित है : मैं नहीं चाहता कि ये किसी की ठोकरों में आएं या झाडख से बुहारी जाएं।”

तेनालीराम का ये उत्तर मजाक उड़ाने वाले दरबारियों के गाल पर तमाचे की तरह जाकर लगा और अगले ही पल पूरे दरबार में सन्नाटा छा गया। महाराज पहले तो गम्भीर हुए मगर फिर एकाएक ही मुस्करा उठे और बोले : “तेनालीराम की स्वामीभक्ति अद्‌भुत है। इन्हें एक परांत भर स्वर्ण मुद्राएं और दी जाएं तथा दोनों परातों की स्वर्ण मुद्राएं सावधानीपूर्वक इनके घर पहुंचाई जाएं।”
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #33
मुंह न दिखाना

एक बार महाराज कृष्णदेव राय किसी बात को लेकर तेनालीराम से नाराज हो गए। क्रोध में उन्होंने तेनालीराम से कह दिया कि कल दरबार में अपना मुंह मत दिखाना, यदि ऐसा किया तो भरे दरबार में कोई लगवाए जाएंगे।

उस समय तो तेनालीराम चला गया। दूसरे दिन जब महाराज दरबार की ओर बढ़ रहे थे तभी एक चुगलखोर राजदरबारी ने उन्हें रास्ते में ही ये कहकर भड़का दिया कि तेनालीराम आपके आदेश के विरुद्ध दरबार में उपस्थित है और तरह-तरह की हरकतें करके सबको हंसा रहा है।

बस, यह सुनते ही महाराज आग-बबूला हो गए : “उसकी इतनी जुर्रत…।” “बड़ा ही ढीठ है महाराज…।” उनके साथ-साथ चलते हुए चुगलखोर दरबारी बोला: “आपने साफ-साफ कहा था कि दरबार में कोड़े पड़ेंगे, इसकी भी उसने कोई परवाह नहीं की: अब तो महाराज के हुक्य की भी अवहेलना करने लगा है।”

जैसे-जैसे वह भड़काता जा रहा था, वैसे-वैसे महाराज के कदमों में तेजी आती जा रही थी। वे दरबार में पहुंचे। देखा कि सिर पर मिट्टी का एक घड़ा ओढ़े वह तरह-तरह की हरकतें कर रहा है। घड़े पर चारों ओर कुछ न कुछ बना हुआ था, कहीं जानवरों के मुंह, कहीं कुछ-कहीं कुछ। “तेनालीराम! ये क्या बेहूदगी है।”

क्रोध से थर-थर कांपते हुए महाराज बोले : “तुमने हमारी आज्ञा का उल्लंघन किया है। दण्डस्वरूप कोड़े खाने को तैयार हो जाओ।” “मैंने कौन सी आपकी आज्ञा नहीं मानी महाराज?” घड़े में मुंह छिपाए-छिपाए ही तेनालीराम बोला: “आपने कहा था कि कल मैं दरबार में अपना मुंह न दिखाऊं-क्या आपको मेरा मुंह दिख रहा है। 

हे भगवान! कहीं कुम्हार ने फूटा घड़ा तो नहीं दे दिया।” यह सुनते ही महाराज की हंसी छूट गई। वे बोले : “सच है, विदूषकों और पागलों पर नाराज होने का कोई भी लाभ नहीं: अब इस घड़े को हटाकर सीधी तरह अपना आसन ग्रहण करो।”
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #34
शिकारी झाड़ियां

ढलती हुई ठंड का सुहाना मौसम था। राजा कृष्णदेव राय वन-विहार के लिए नगर से बाहर डेरा डाले हुए थे। ऐसा हर वर्ष होता था। महाराज के साथ में कुछ दरबारी और सैनिक भी आए हुए थे।

पूरे खेमे में खुशी का माहौल था। कभी गीत-संगीत की महफिल जमती तो कभी किस्से-कहानियों का दौर चल पड़ता। इसी प्रकार आमोद-प्रमोद में कई दिन गुजर गए। एक दिन राजा कृष्णदेव राय अपने दरबारियों से बोले : “वन-विहार को आए हैं तो शिकार जरूर करेंगे।”

तुरंत शिकार की तैयारियां होने लगीं। कुछ देर बाद पूरा लाव-लश्कर शिकार के लिए निकल पड़ा। सभी अपने-अपने घोड़ों पर सवार थे। तेनालीराम भी जब उन सबके साथ चलने लगा तो एक मंत्री बोला : “महाराज, तेनालीराम को साथ ले जाकर क्या करेंगे। यह तो अब बूढ़े हो गए हैं, इन्हें यहीं रहने दिया जाए।

हमारे साथ चलेंगे तो बेचारे थक जाएंगे।” मंत्री की बात सुनकर सारे दरबारी हंस पड़े लेकिन तेनालीराम चूंकि राजा के स्नेही थे, इसलिए उन्होंने तेनालीराम को भी अपने साथ ले लिया। थोड़ी देर का सफर तय करके सब लोग जंगल के बीचों-बीच पहुंच गए।

तभी राजा कृष्णदेव राय को एक हष्ट-पुष्ट हिरन दिखाई दिया। राजा उसका पीछा करने लगे। सभी दरबारी भी उनके पीछे थे। पीछा करते-करते वे घने जंगल में पहुंच गए राजा घनी झाड़ियों के बीच बढ़ते जा रहे थे।

एक जगह पर आकर उन्हें हिरन अपने बहुत ही पास दिखाई दिया तो उन्होंने निशाना साधा। घोड़ा अभी भी दौड़ता जा रहा था और महाराज कमान पर चढ़ा तीर छोड़ने ही वाले कि अचानक तेनालीराम जोर से चिल्लाया : “रुक जाइए महाराज, इसके आगे जाना ठीक नहीं।”


राजा कृष्णदेव राय ने फौरन घोड़ा रोका। इतने में हिरन उनकी पहुंच से बाहर निकल गया। तेनालीराम के कारण हिरन को हाथ से निकलते देख महाराज को बहुत गुस्सा आया। वह तेनालीराम पर बरस पड़े, “तेनालीराम! तुम्हारी वजह से हाथ में आया शिकार निकल गया।”

मगर अचानक ही उन्हें कुछ याद आया और मंत्री से मुखातिब होकर वे बोले: “मंत्री जी, इस पेड़ पर चढ़कर हिरन को देखें तभी कुछ कहूंगा या बताऊंगा।” मंत्रीजी पेड़ पर चढ़े तो उन्होंने एक विचित्र ही नजारा देखा। हिरन जंगली झाड़ियों के बीच फंसा जोर-जोर से चीख और उछल रहा था।

उसका सारा शरीर लहूलुहान हो गया था। ऐसा लगता था जैसे जंगली झाड़ियों ने उसे अपने पास खींच लिया हो। वह भरपूर जोर लगाकर झाड़ियों के चंगुल से छूटने की कोशिश कर रहा था। आखिरकार बड़ी मुश्किल से वह अपने आपको उन झाड़ियों से छुड़ाकर भाग लिया।

मंत्री ने पेड़ से उतरकर यह सारी बात राजा को बताई। राजा यह सब सुनकर हैरान रह गए और बोले: “तेनालीराम, यह सब क्या है ?” “महाराज, यहां से आगे खतरनाक नरभक्षी झाड़ियां हैं। जिनके कांटे शरीर में चुभकर प्राणियों का खून पीने लगते हैं।

जो जीव इनकी पकड़ में आया-वह अधमरा होकर ही इनसे छूटा। पेड़ से मंत्रीजी ने स्वयं हिरन का हश्र देख लिया, इसलिए मैंने आपको रोका था।” अब राजा कृष्णदेव राय ने गर्व से मंत्री और दरबारियों की ओर देखा और कहा, “देखा, तुम लोगों ने, तेनालीराम को साथ लाना क्यों जरूरी था ?” मंत्री और सारे दरबारी अपना-सा मुंह लेकर रह गए और एक दूसरे की ओर ताकने लगे।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #35
अरबी घोड़े

महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में एक दिन एक अरब प्रदेश का व्यापारी घोड़े बेचने आता है। वह अपने घोड़ो का बखान कर के महाराज कृष्णदेव राय को सारे घोड़े खरीदने के लिए राजी कर लेता है तथा अपने घोड़े बेच जाता है। अब महाराज के घुड़साल इतने अधिक घोड़े हो जाते हैं कि उन्हें रखने की जगह नहीं बचती, इसलिए महाराज के आदेश पर बहुत से घोड़ों को विजयनगर के आम नागरिकों और राजदरबार के कुछ लोगों को तीन महीने तक देखभाल के लिए दे दिया जाता है। हर एक देखभाल करने वाले को घोड़ों के पालन खर्च और प्रशिक्षण के लिए प्रति माह एक सोने का सिक्का दिया जाता है।

विजयनगर के सभी नागरिकों की तरह चतुर तेनालीराम को भी एक घोडा दिया गया। तेनालीराम ने घोड़े को घर लेजा कर घर के पिछवाड़े एक छोटी सी घुड़साल बना कर बांध दिया। और घुड़साल की नन्ही खिड़की से उसे हर रोज थोड़ी मात्रा में चारा खिलाने लगे।

बाकी लोग भी महाराज कृष्णदेव राय की सौंपी गयी ज़िम्मेदारी को निभाने लगे। महाराज नाराज ना हो जाए और उन पर क्रोधित हो कोई दंड ना दे दें; इस भय से सभी लोग अपना पेट काट-काट कर भी घोड़े को उत्तम चारा खरीद कर खिलाने लगे।

ऐसा करते-करते तीन महीने बीत जाते हैं। तय दिन सारे नागरिक घोड़ो को ले कर महाराज कृष्णदेव राय के समक्ष इकठ्ठा हो जाते हैं। पर तेनालीराम खाली हाथ आते हैं। राजगुरु तेनालीराम के घोड़ा ना लाने की वजह पूछते है। तेनालीराम उत्तर मे कहते है कि घोड़ा काफी बिगडैल और खतरनाक हो चुका है, और वह खुद उस घोड़े के समीप नहीं जाना चाहते हैं। राजगुरु , महाराज कृष्णदेव राय को कहते है के तेनालीराम झूठ बोल रहे है। महाराज कृष्णदेव राय सच्चाई का पता लगाने के लिए और तेनालीराम के साथ राजगुरु को भेजते हैं।

तेनालीराम के घर के पीछे बनी छोटी सी घुड़साल देख राजगुरु कहते है कि अरे मूर्ख मानव तुम इस छोटी कुटिया को घुड़साल कहते हो? तेनालीराम बड़े विवेक से राजगुरु से कहते है के क्षमा करें मैं आप की तरह विद्वान नहीं हूँ। कृपया घोड़े को पहले खिड़की से झाँक कर देख लें। और उसके पश्चात ही घुड़साल के अंदर कदम रखें।

राजगुरु जैसे ही खिड़की से अंदर झाँकते हैं, घोडा लपक कर उनकी दाढ़ी पकड़ लेता है। लोग जमा होने लगते हैं। काफी मशक्कत करने के बाद भी भूखा घोड़ा राजगुरु की दाढ़ी नहीं छोड़ता है। अंततः कुटिया तोड़ कर तेज हथियार से राजगुरु की दाढ़ी काट कर उन्हे घोड़े के चंगुल से छुड़ाया जाता है। परेशान राजगुरु और चतुर तेनालीराम भूखे घोड़े को ले कर राजा के पास पहुँचते हैं।

घोड़े की दुबली-पतली हालत देख कर महाराज कृष्णदेव राय तेनालीराम से इसका कारण पूछते हैं। तेनालीराम कहते है कि मैं घोड़े को प्रति दिन थोड़ा सा चारा ही देता था, जिस तरह आप की गरीब प्रजा थोड़ा भोजन कर के गुजारा करती है। और आवश्यकता से कम सुविधा मिलने के कारण घोडा और व्यथित और बिगड़ेल होता गया। ठीक वैसे ही जैसे के आप की प्रजा परिवार पालन की जिम्मेदारी के अतिरिक्त, घोड़ो को संभालने के बोझ से त्रस्त हुई।

राजा का कर्तव्य प्रजा की रक्षा करना होता है। उन पर अधिक बोझ डालना नहीं। आपके दिये हुए घोड़े पालने के कार्य-आदेश से घोड़े तो बलवान हो गए पर आप की प्रजा दुर्बल हो गयी है। महाराज कृष्णदेव राय को तेनालीराम की यह बात समझ में आ जाती है, और वह तेनालीराम की प्रसंशा करते हुए उन्हे पुरस्कार देते है।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #36
स्वर्ग की खोज

महाराज कृष्णदेव राय अपने बचपन में सुनी कथा अनुसार यह विश्वास करते थे कि संसार-ब्रह्मांड की सबसे उत्तम और मनमोहक जगह स्वर्ग है। एक दिन अचानक महाराज को स्वर्ग देखने की इच्छा उत्पन्न होती है, इसलिए दरबार में उपस्थित मंत्रियों से पूछते हैं, ” बताइए स्वर्ग कहाँ है ?”

 सारे मंत्रीगण सिर खुजाते बैठे रहते हैं पर चतुर तेनालीराम महाराज कृष्णदेव राय को स्वर्ग का पता बताने का वचन देते हैं। और इस काम के लिए दस हजार सोने के सिक्के और दो माह का समय मांगते हैं।

महाराज कृष्णदेव राय तेनालीराम को सोने के सिक्के और दो माह का समय दे देते हैं और शर्त रखते हैं कि अगर तेनालीराम ऐसा न कर सके तो उन्हे कड़ा दंड दिया जाएगा। अन्य दरबारी तेनालीराम की कुशलता से काफी जलते हैं। और इस बात से मन ही मन बहुत खुश होते हैं कि तेनालीराम स्वर्ग नहीं खोज पाएगा और सजा भुगतेगा।

दो माह की अवधि बीत जाती है, महाराज कृष्णदेव राय तेनालीराम को दरबार में बुलवाते हैं। तेनालीराम कहते हैं के उन्होने स्वर्ग ढूंढ लिया है और वे कल सुबह स्वर्ग देखने के लिए प्रस्थान करेंगे।

अगले दिन तेनालीराम, महाराज कृष्णदेव राय और उनके खास मंत्रीगणों को एक सुंदर स्थान पर ले जाते हैं। जहां खूब हरियाली, चहचहाते पक्षी, और वातावरण को शुद्ध करने वाले पेड़ पौधे होते हैं। जगह का सौंदर्य देख महाराज कृष्णदेव राय अति प्रसन्न होते हैं। पर उनके अन्य मंत्री गण स्वर्ग देखने की बात महाराज कृष्णदेव राय को याद दिलाते रहते हैं।

महाराज कृष्णदेव राय भी तेनालीराम से उसका वादा निभाने को कहते हैं। उसके जवाब में तेनालीराम कहते हैं कि जब हमारी पृथ्वी पर फल, फूल, पेड़, पौधे, अनंत प्रकार के पशु, पक्षी, और अद्भुत वातावरण और अलौकिक सौन्दर्य है। फिर स्वर्ग की कामना क्यों? जबकि स्वर्ग जैसी कोई जगह है भी इसका कोई प्रमाण नहीं है।

महाराज कृष्णदेव राय को चतुर तेनालीराम की बात समझ आ जाती है और वो उनकी प्रसंशा करते हैं।बाकी मंत्री जलन के मारे महाराज को दस हज़ार सोने के सिक्कों की याद दिलाते हैं। तब महाराज कृष्णदेव राय तेनालीराम से पूछते हैं कि उन्होंने उन सिक्को का क्या किया?

तब तेनालीराम कहते हैं कि वह तो उन्होने खर्च कर दिये!

तेनालीराम कहते हैं कि आपने जो दस हजार सोने के सिक्के दिये थे उनसे मैंने इस जगह से उत्तम पौधे और उच्च कोटी के बीज खरीदे हैं। जिनको हम अपने राज्य विजयनगर की जमीन में प्रत्यर्पित करेंगे; ताकि हमारा राज्य भी इस सुंदर स्थान के समीप आकर्षक और उपजाऊ बन जाए।

महाराज इस बात से और भी प्रसन्न हो जाते हैं और तेनालीराम को ढेरों इनाम देते हैं। और एक बार फिर बाकी मंत्री अपना सा मुंह ले कर रह जाते हैं!
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #37
तेनालीराम ने चोरों को पकड़ा

एक बार की बात है विजयनगर राज्य में बहुत चोरी होने लगी। लोगों के घर से दिन दहाड़े कीमती सामान गायब होने लगे। लोग इस बात से बहुत डर गए और परेशान हो कर राजा कृष्णदेव राय के दरबार में पहुंचे।

यह जान कर राजा को बहुत घुस्सा आया और तुरंत अपने सैनिकों को चोरों को पकड़ने का आदेश दिया। जगह-जगह राज्य में सैनिकों को तैनात किया गया पर तब भी चोर चोरी करने में कामियाब होने लगे।

तब राजा ने अपने चतुर विदूषक तेनालीराम को इस मुश्किल का हल निकालने के लिए कहा और साथ ही राजा ने सैनिकों की एक टुकड़ी भी तेनाली के साथ भेजने के लिए आदेश दिया। पर तेनाली ने राजा से कहा की उन्हें किसी भी सेना की आवश्यकता नहीं है और वह स्वयं ही चोरों को एक हफ्ते के अन्दर पकड़ लेगा।

तेनालीराम की बात सुनकर दरबार के अन्य लोग हंसने लगे और सोचने लगे जिन चोरों को राज्य की सेना मिलकर नहीं पकड़ पा रहे हैं उसे तेनाली अकेले कैसे पकड़ेगा।

अगले दिन सुबह राज्य के कुछ लोग बात कर रहे थे की राज्य के सबसे बड़े सेठ लक्ष्मी चंद को एक नया मंत्र पता चला है जिसके मुताबिक तिज़ोरी खोल कर सोने से भी कोई चोर चोरी नहीं कर सकता। यह बात जब चोरों के कान में लगी तो वो खुश हुए।

उसी रात वो चोर सेठ लक्ष्मी चंद के घर पहुंचे। उन्होंने देखा की तिजोरी खुला हुआ है तो वो बहुत खुश हुए और उन्होंने अँधेरे में चुपके से सभी पैसे और कीमती सामन को चोरी कर लिया।

अगले दिन सुबह दरबार में जब यह बात पहुंची तो राजा सेठ पर क्रोधित हुए और बोले जब तुम जानते ही थे की राज्य में चोरी हो रही है तो तुम्हें तिज़ोरी खुला रखने की आवश्यकता क्या था? तभी सभा में तेनालीराम पहुंचे उनके पीछे दो लोगों को बांध कर रखा गया था। राजा ने पुछा ये कौन हैं? तब तेनाली ने बताया ये वो चोर हैं जो कुछ दिनों से राज्य में चोरी कर रहे हैं।

राजा ने तेनालीराम से पुछा कि तुमने ऐसा कैसे किया? तब तेनाली ने बताया – कल मैंने ही सेठ लक्ष्मी चंद को तिजोरी खुला रखने के लिए कहा था और पुरे राज्य में अपने कुछ लोगों के द्वारा इस बात को फैला दिया। सेठ के कमरे में मैंने सभी जगह जमीन पर काला रंग बिछा दिया था।

रात को जब चोर चोरी करने के लिए गए तो काला रंग उनके पैरों में लग गया। जब पैरों के निशान की मदद से हमने उनका पीछा किया तो पता चला कि उन चोरों से हमारे राज्य के पुराने मंत्री चोरी करवा रहे थे। इस प्रकार हमने चोरों को और उस पुराने मंत्री को पकड़ लिया।

राजा बहुत खुश हुए और उन्होंने तेनालीराम का धन्यवाद किया और इनाम भी दिया।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #38

मूर्खों का साथ हमेशा दुखदायी

विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय जहां कहीं भी जाते, जब भी जाते, अपने साथ हमेशा तेनालीराम को जरूर ले जाते थे। इस बात से अन्य दरबारियों को बड़ी चिढ़ होती थी।एक दिन तीन-चार दरबारियों ने मिलकर एकांत में महाराज से प्रार्थना की, ‘महाराज, कभी अपने साथ किसी अन्य व्यक्ति को भी बाहर चलने का अवसर दें।

’ राजा को यह बात उचित लगी।उन्होंने उन दरबारियों को विश्वास दिलाया कि वे भविष्य में अन्य दरबारियों को भी अपने साथ घूमने-फिरने का अवसर अवश्य देंगे।एक बार जब राजा कृष्णदेव राय वेष बदलकर कुछ गांवों के भ्रमण को जाने लगे तो अपने साथ उन्होंने इस बार तेनालीराम को नहीं लिया बल्कि उसकी जगह दो अन्य दरबारियों को साथ ले लिया।

घूमते-घूमते वे एक गांव के खेतों में पहुंच गए। खेत से हटकर एक झोपड़ी थी, जहां कुछ किसान बैठे गपशप कर रहे थे। राजा और अन्य लोग उन किसानों के पास पहुंचे और उनसे पानी मांगकर पिया।फिर राजा ने किसानों से पूछा, ‘कहो भाई लोगों, तुम्हारे गांव में कोई व्यक्ति कष्ट में तो नहीं है? अपने राजा से कोई असंतुष्ट तो नहीं है?’इन प्रश्नों को सुनकर गांव वालों को लगा कि वे लोग अवश्य ही राज्य के कोई अधिकारीगण हैं।

वे बोले, ‘महाशय, हमारे गांव में खूब शांति है, चैन है। सब लोग सुखी हैं। दिनभर कडी़ मेहनत करके अपना कामकाज करते हैं और रात को सुख की नींद सोते हैं।

 किसी को कोई दुख नहीं है।राजा कृष्णदेव राय अपनी प्रजा को अपनी संतान की तरह प्यार करते हैं इसलिए राजा से असंतुष्ट होने का सवाल ही नहीं पैदा होता।

‘इस गांव के लोग राजा को कैसा समझते हैं?’ राजा ने एक और प्रश्न किया।राजा के इस सवाल पर एक बूढ़ा किसान उठा और ईख के खेत में से एक मोटा-सा गन्ना तोड़ लाया। उस गन्ने को राजा को दिखाता हुआ वह बूढ़ा किसान बोला, ‘श्रीमानजी, हमारे राजा कृष्णदेव राय बिलकुल इस गन्ने जैसे हैं।’अपनी तुलना एक गन्ने से होती देख राजा कृष्णदेव राय सकपका गए। उनकी समझ में यह बात बिलकुल भी न आई कि इस बूढ़े किसान की बात का अर्थ क्या है? उनकी यह भी समझ में न आया कि इस गांव के रहने वाले अपने राजा के प्रति क्या विचार रखते हैं?राजा कृष्णदेव राय के साथ जो अन्य साथी थे, राजा ने उन साथियों से पूछा, ‘इस बूढ़े किसान के कहने का क्या अर्थ है?’साथी राजा का यह सवाल सुनकर एक-दूसरे का मुंह देखने लगे।

 फिर एक साथी ने हिम्मत की और बोला, ‘महाराज, इस बूढ़े किसान के कहने का साफ मतलब यही है कि हमारे राजा इस मोटे गन्ने की तरह कमजोर हैं। उसे जब भी कोई चाहे, एक झटके में उखाड़ सकता है, जैसे कि मैंने यह गन्ना उखाड़ लिया है।

’राजा ने अपने साथी की इस बात पर विचार किया तो राजा को यह बात सही मालूम हुई। वे गुस्से से भर गए और इस बूढ़े किसान से बोले, ‘तुम शायद मुझे नहीं जानते कि मैं कौन हूं?’ राजा की क्रोध से भरी वाणी सुनकर वह बूढ़ा किसान डर के मारे थर-थर कांपने लगा।तभी झोपड़ी में से एक अन्य बूढ़ा उठ खड़ा हुआ और बड़े नम्र स्वर में बोला- ‘महाराज, हम आपको अच्छी तरह जान गए हैं, पहचान गए हैं, लेकिन हमें दुख इस बात का है कि आपके साथी ही आपके असली रूप को नहीं जानते।

मेरे साथी किसान के कहने का मतलब यह है कि हमारे महाराज अपनी प्रजा के लिए तो गन्ने के समान कोमल और रसीले हैं किंतु दुष्टों और अपने दुश्मनों के लिए महानतम कठोर भी।

’ उस बूढ़े ने एक कुत्ते पर गन्ने का प्रहार करते हुए अपनी बात पूरी की।इतना कहने के साथ ही उस बूढ़े ने अपना लबादा उतार फेंका और अपनी नकली दाढ़ी-मूंछें उतारने लगा।उसे देखते ही राजा चौंक पड़े। ‘तेनालीराम, तुमने यहां भी हमारा पीछा नहीं छोड़ा।

’‘तुम लोगों का पीछा कैसे छोड़ता भाई? अगर मैं पीछा न करता तो तुम इन सरल हृदय किसानों को मौत के घाट ही उतरवा देते। महाराज के दिल में क्रोध का ज्वार पैदा करते, सो अलग।’‘तुम ठीक ही कह रहे हो तेनालीराम। मूर्खों का साथ हमेशा दुखदायी होता है। भविष्य में मैं कभी तुम्हारे अलावा किसी और को साथ नहीं रखा करूंगा।


’उन सबकी आपस की बातचीत से गांव वालों को पता चल ही गया था कि उनकी झोपड़ी पर स्वयं महाराज पधारे हैं और भेष बदलकर पहले से उनके बीच बैठा हुआ आदमी ही तेनालीराम है तो वे उनके स्वागत के लिए दौड़ पड़े।कोई चारपाई उठवाकर लाया तो कोई गन्ने का ताजा रस निकालकर ले आया।

 गांव वालों ने बड़े ही मन से अपने मेहमानों का स्वागत किया। उनकी आवभगत की। राजा कृष्णदेव राय उन ग्रामवासियों का प्यार देखकर आत्मविभोर हो गए। तेनालीराम की चोट से आहत हुए दरबारी मुंह लटकाए हुए जमीन कुरेदते रहे और तेनालीराम मंद-मंद मुस्करा रहे थे।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #39
महान पुस्तक

एक बार राजा कृष्णदेव राय के दरबार में एक महान विद्वान आया। उसने वहां दरबार में उपस्थित सभी विद्वानों को चुनौती दी कि पूरे विश्व में उसके समान कोई बुद्धिमान व विद्वान नहीं है।

उसने दरबार में उपस्थित सभी दरबारियों से कहा कि यदि उनमें से कोई चाहे तो उसके साथ किसी भी विषय पर वाद-विवाद कर सकता है, परंतु कोई भी दरबारी उससे वाद-विवाद करने का साहस न कर सका।अंत में सभी दरबारी सहायता के लिए तेनालीराम के पास गए।

 तेनालीराम ने उन्हें सहायता का आश्वासन दिया और दरबार में जाकर तेनाली ने विद्वान की चुनौती स्वीकार कर ली। दोनों के बीच वाद-विवाद का दिन भी निश्चित कर दिया गया।निश्चित दिन तेनालीराम एक विद्वान पंडित के रूप में दरबार पंहुचा।

 उसने अपने एक हाथ में एक बड़ा-सा गट्ठर ले रखा था, जो देखने में भारी पुस्तकों के गट्ठर के समान लग रहा था।शीघ्र ही वह महान विद्वान भी दरबार में आकर तेनालीराम के सामने बैठ गया।

पंडितरूपी तेनालीराम ने राजा को सिर झुकाकर प्रणाम किया और गट्ठर को अपने और विद्वान के बीच में रख दिया, तत्पश्चात दोनों वाद-विवाद के लिए बैठ गए।राजा जानते थे कि पंडित का रूप धरे तेनालीराम के मस्तिष्क में अवश्य ही कोई योजना चल रही होगी इसलिए वे पूरी तरह आश्वस्त थे। अब राजा ने वाद-विवाद आरंभ करने का आदेश दिया।

पंडित के रूप में तेनालीराम पहले अपने स्थान पर खड़ा होकर बोला, ‘विद्वान महाशय! मैंने आपके विषय मैं बहुत कुछ सुना है। आप जैसे महान विद्वान के लिए मैं एक महान तथा महत्वपूर्ण पुस्तक लाया हूं जिस पर हम लोग वाद-विवाद करेंगे।

‘महाशय! कृपया मुझे इस पुस्तक का नाम बताइए।’ विद्वान ने कहा।तेनालीराम बोले, ‘विद्वान महाशय, पुस्तक का नाम है, ‘तिलक्षता महिषा बंधन’विद्वान हैरान हो गया।

 अपने पूरे जीवन में उसने इस नाम की कोई पुस्तक न तो सुनी थी न ही पढ़ी थी। वह घबरा गया कि बिना पढ़ी व सुनी हुई पुस्तक के विषय में वह कैसे वाद-विवाद करेगा?फिर भी वह बोला, ‘अरे, यह तो बहुत ही उच्च कोटि की पुस्तक है। 

इस पर वाद-विवाद करने में बहुत ही आनंद आएगा, परंतु आज यह वाद-विवाद रहने दिया जाए। मेरा मन भी कुछ उद्विग्न है और इसके कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को मैं भूल भी गया हूं।


 कल प्रातः स्वस्थ व स्वच्छ मस्तिष्क के साथ हम वाद-विवाद करेंगे।’तेनालीराम के अनुसार वह विद्वान तो आज के वाद-विवाद के लिए पिछले कई दिनों से प्रतीक्षा कर रहा था, परंतु अतिथि की इच्छा का ध्यान रखना तेनाली का कर्तव्य था इसलिए वह सरलता से मान गया। परंतु वाद-विवाद में हारने के भय से वह विद्वान नगर छोड़कर भाग गया।

अगले दिन प्रातः जब विद्वान शाही दरबार में उपस्थित नहीं हुआ तो तेनालीराम बोला, ‘महाराज, वह विद्वान अब नहीं आएगा। वाद-विवाद में हार जाने के भय से लगता है, वह नगर छोड़कर चला गया है।

‘तेनाली, वाद-विवाद के लिए लाई गई उस अनोखी पुस्तक के विषय में कुछ बताओ जिससे कि डरकर वह विद्वान भाग गया?’ राजा ने पूछा।महाराज, वास्तव में ऐसी कोई भी पुस्तक नहीं है। 

मैंने ही उसका यह नाम रखा था।‘तिलक्षता महिषा बंधन’, इसमें ‘तिलक्षता’ का अर्थ है ‘शीशम की सूखी लकड़ियां’ और ‘महिषा बंधन’ का अर्थ है, ‘वह रस्सी जिससे भैंसों को बांधा जाता है।

’मेरे हाथ में वह गट्ठर वास्तव में शीशम की सूखी लकड़ियों का था, जो कि भैंस को बांधने वाली रस्सी से बंधी थीं। उसे मैंने मलमल के कपड़े में इस तरह लपेट दिया था ताकि वह देखने में पुस्तक जैसी लगे।

‘तेनालीराम की बुद्धिमता देखकर राजा व दरबारी अपनी हंसी नहीं रोक पाए। राजा ने प्रसन्न होकर तेनालीराम को ढेर सारा पुरस्कार दिया।
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Best Tenali Rama stories in Hindi moral #
मटके में मुंह

एक बार महाराज कृष्णदेव राय किसी बात पर तेनालीराम से नाराज हो गए। गुस्से में आकर उन्होंने तेनालीराम से भरी राजसभा में कह दिया कि कल से मुझे दरबार में अपना में अपना मुंह मत दिखाना। उसी समय तेनालीराम दरबार से चला गया।दूसरे दिन जब महाराज राजसभा की ओर आ रहे थे तभी एक चुगलखोर ने उन्हें यह कहकर भड़का दिया कि तेनालीराम आपके आदेश के खिलाफ दरबार में उपस्थित है।बस यह सुनते ही महाराज आग-बबूला हो गए। 

चुगलखोर दरबारी आगे बोला- आपने साफ कहा था कि दरबार में आने पर कोड़े पड़ेंगे, इसकी भी उसने कोई परवाह नहीं की। अब तो तेनालीराम आपके हुक्म की भी अवहेलना करने में जुटा है।राजा दरबार में पहुंचे। उन्होंने देखा कि सिर पर मिट्टी का एक घड़ा ओढ़े तेनालीराम विचित्र प्रकार की हरकतें कर रहा है। 

घड़े पर चारों ओर जानवरों के मुंह बने थे।तेनालीराम! ये क्या बेहुदगी है। तुमने हमारी आज्ञा का उल्लंघन किया हैं’, महाराज ने कहा। 

दंडस्वरूप कोड़े खाने के तैयार हो जाओ।मैंने कौन-सी आपकी आज्ञा नहीं मानी महाराज?’घड़े में मुंह छिपाए हुए तेनालीराम बोला- ‘आपने कहा था कि कल मैं दरबार में अपना मुंह न दिखाऊं तो क्या आपको मेरा मुंह दिख रहा है। हे भगवान! कहीं कुम्भकार ने फूटा घड़ा तो नहीं दे दिया।’

यह सुनते ही महाराज की हंसी छूट गई। वे बोले- ‘तुम जैसे बुद्धिमान और हाजिरजवाब से कोई नाराज हो ही नहीं सकता। अब इस घड़े को हटाओ और सीधी तरह अपना आसन ग्रहण करो।’

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