महादेवी वर्मा(Mahadevi Verma) जीवन परिचय

महादेवी वर्मा(Mahadevi Verma)
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जीवन परिचय

(1)जन्म: 26 मार्च, 1907
स्थान-फ़र्रुख़ाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत
(2)मृत्यु: 11 सितंबर, 1987
स्थान-इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत
(5) पिता: बाबू गोविन्द प्रसाद वर्मा
(4) माता:हेमरानी देवी
(5)कार्यक्षेत्र: अध्यापक, लेखक
(6)राष्ट्रीयता: भारतीय

(8)काल: आधुनिक काल
(9)विधा: गद्य और पद्य
(10)विषय: गीत, रेखाचित्र, संस्मरण व निबंध
(11)साहित्यिक आन्दोलन: छायावाद व रहस्यवाद
(12)प्रमुख कृतियाँ: यामा कविता संग्रह

प्रमुख कृतियां

नीहार (1930)
रश्मि (1932)
नीरजा (1934)
सांध्‍यगीत (1935)
दीपशिखा (1942)

संकलन

यामा (1940)
दीपगीत (1983)
नीलांबरा (1983)
पुरस्‍कार

ज्ञानपीठ पुरस्‍कार (यामा के लिए/1982)

भारत-भारती (1943)
पद्म विभूषण (1988)

हिंदी साहित्‍य को जिन रचनाकारों ने अपनी अलग पहचान के साथ समृद्ध किया है, उनमें महादेवी वर्मा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. महादेवी हिंदी साहित्‍य के छायावादी युग की कवयित्री हैं. इनकी कविताओं में करुणा, संवेदना और दुख के पुट की अधिकता है. इन्‍हें ‘आधुनिक मीराबाई’ भी कहा जाता है.

महादेवी वर्मा के शहर फर्रुखाबाद में पैदा होना मेरे लिए दो तरह से खास रहा है. एक ओर हिंदी की तमाम किताबों में जब भी ‘विरह वेदना की कवियत्री’ के तौर पर जब भी महादेवी का ज़िक्र आता तो एक अपनेपन का अहसास होता था. दूसरा लिखने-पढ़ने से जुड़े रहने के चलते महादेवी के नाम पर होने वाली तमाम साहित्यिक गतिविधियों (कुछ एक को हरकतें भी कह सकते हैं) से पाला पड़ता रहा है.

महादेवी के शहर में उनके नाम पर साल भर में एक दो कवि सम्मेलन वगैरह होता रहते हैं मगर शहर के किसी बुक स्टोर पर आपको महादेवी की किताबें नहीं मिलेगी. कोई संग्रहालय, पुस्तकालय, कॉलेज या ऐसा कुछ भी नहीं मिलेगा जिसके साथ ये शहर अपनी इस साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ा सके.

ले दे कर शहर के एक तिराहे पर लगी उनकी एक मूर्ति ही महादेवी और फर्रुखाबाद के बीच बाकी इकलौती पहचान है. अगर कहीं आप उनका घर देखने जाएंगे तो ये तलाश एक गली पर आकर खत्म हो जाएगी.

कुछ साल पहले महादेवी वर्मा के पैतृक घर को किसी ने खरीद लिया था. इस पर साहित्य से जुड़े लोगों ने कई नेताओं और सरकारी संस्थाओं से अपील की कि इस जगह को बचाया जाए. मामला कुछ लाख की मदद पर था इसके बाद आश्वासन आते रहे.

आज स्थिति ये है कि उस गली में कुछ कारखाने खुले हुए हैं जिनमें से महादेवी का घर कौन सा था पुरानी पीढ़ी के कुछ लोगों के अलावा किसी को नहीं पता. अब ये उम्मीद करना बेमानी ही है कि इस दिशा में कोई काम होगा. महादेवी ने लिखा था, ‘पथ को न मलिन करता आना, पदचिन्ह न दे जाता जाना’ हिंदुस्तान के सिस्टम और बाकी सब ने मिलकर ने इसको सार्थक कर दिया.
 कभी-कभी लगता है कि अगर महादेवी की जातीय पहचान को थोड़ा भुना लिया जाता तो शायद स्थिति दूसरी होती.

पांच साल की उम्र में पहली कविता

महादेवी ने पांच साल की उम्र में पहली कविता लिखी थी जो कुछ इस तरह से थी,

‘ठंडे पानी से नहलाते,

उनका भोग खुद खा जाते,

फिर भी कुछ नहीं बोले हैं,

मां! ठाकुर जी भोले हैं.’

मीरा से अलग थी महादेवी

हिंदी साहित्य में महादेवी को अक्सर आधुनिक मीरा कहा जाता है. कारण ये है कि दोनों ने पीड़ा की बात की है. मगर महादेवी और मीरा की पीड़ा की अनुभूति और उसकी व्याख्या में फर्क है. एक ओर मीरा बार-बार कहती हैं, ‘मीरा की प्रभु पीर मिटै जब वैद संविरया होए’ वहीं महादेवी कहीं भी पीड़ा से मुक्ति की बात नहीं करती हैं. जब महादेवी कहती हैं ‘तुम मुझमें, फिर परिचय क्या’ तो उनकी कविता में प्रेम को पाने के लिए एक तरह से विरक्ति ही दिखती है.

कह सकते हैं कि मीरा के प्रेम में जहां पीड़ा से मुक्ति के लिए प्रेम को पाने की आकांक्षा बाकी है, महादेवी पीड़ा को ही प्रेम मान चुकी हैं. इस बात को वो बार-बार दोहराती हैं. वो कहती हैं, ‘शाप हूं जो बन गया वरदान. बंधन में कूल भी हूं, कूलहीन प्रवाहिनी भी हूं!’

विद्रोह की कविता भी लिखी हैं

महादेवी के बारे में प्रचलित है कि वो विरह-वेदना की कवयित्री रही हैं. मगर जीवन के अंतिम वर्ष में उन्होंने ‘अग्निवीणा’ शीर्षक से कुछ विद्रोह की कविताएं भी लिखी हैं. 'रात के इस सघन अंधेरे में जूझता-सूर्य नहीं, जूझता रहा दीपक!'

हिंदी साहित्य के बड़े संसार में महादेवी एक अलग मुकाम खड़ी दिखती हैं. अपनी कविताओं, रेखाचित्रों और संस्मरणों के साथ वो गिनी चुनी रचनाकारों में है जिन्हें आलोचक ‘महिला’ के टैग के साथ नहीं रख पाते हैं. जबकि खुद महादेवी अपने बारे में कहती हैं,

‘परिचय इतना इतिहास यही,

उमड़ी कल थी मिट आज चली,

मैं नीर भरी दुख की बदली’

महादेवी और बौद्ध दर्शन की छाप

वैसे तो अपने देश की संस्‍कृति में हर कन्‍या या स्‍त्री को देवी को दर्जा दिया जाता है. इनके परिवार में सात पीढ़ियों के बाद कोई लड़की पैदा हुई थी, इसलिए इनका नाम महादेवी रखा गया. आगे चलकर इन्‍होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़कर अपने नाम को सार्थक किया.

महादेवी का निजी जीवन उस दौर की अन्‍य महिलाओं से काफी अलग रहा. तब बाल विवाह चलन में था. जब ये 9 बरस की थीं, तभी इनका विवाह कर दिया गया. विवाह के वक्‍त वे अबोध बालिका थीं, पर बाद में भी ताउम्र वैवाहिक जीवन के प्रति वे उदासीन बनी रहीं. कारण पूरी तरह स्‍पष्‍ट नहीं, लेकिन इसके पीछे बौद्ध दर्शन का प्रभाव माना जा सकता है. वे बौद्ध भिक्षुणी बनना चाहती थीं, पर बाद में कर्मयोग को अपनाया.

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